कविताएं पिसती है सिर्फ जनता नेता लोगों को बहलाता है नए-नए ख्वाब दिखाता है कुर्सी पर बैठते ही हम सबको आंख दिखाता है पत्रकार झूठी-सुच्ची खबरें लाता है जनता की

कविताJune 19, 2018

कविता बदबू किस ओर चला जा रहा है जीवन, निरर्थक व्यर्थ लाचार क्यों चेतना बांझ हो गई और हो गई है अपंग मस्तिष्क में कूब निकल आया है और हो

कहानीJune 19, 2018

कहानी संकट-मोचन        क्योंकि वे बंदर थे अतः स्वाभाविक रूप से उनकी उछल-कूद, उनके उत्पात सब बंदरों वाले थे। गांव वाले उनसे तंग आ चुके थे। गांव के साथ कुछ

इतिहास के पन्नों से…   -जार्ज थॉमस प्रकरण के बहाने- हरियाणा के इतिहास में राजनीतिक अराजकता की एक तस्वीर हरियाणा का इतिहास दिल्ली के इतिहास के साथ एकदम जुड़ा रहा

कहानीJune 19, 2018

कहानी  अंतोन चेखव का जन्म 19 वीं शताब्दी के रूढि़वादी रूस में हुआ था। इनकी मां के पास कहानियों का भण्डार था जिनको वो नियमित तौर पर बड़े रोचकपूर्ण तरीके

कविता चौपाये अतीत प्रतिबद्ध हैं वे कटिबद्ध हैं वे वर्तमान व भविष्य को स्वर्णिम अतीत की ओर धकेलने को चलो धकेलो-पेलो धकेलते चलो पेलते चलो राज पथ पर जन-जन को

कविता वे बरसने वाले हैं पंजाब से खबर आई है सुरजीत ने अपना ट्रेक्टर औने-पौने दामों में बेच दिया है खेती के छोटे-मोटे औजार कबाड़ी की रद्दी झोली में डाल

मीडियाJune 19, 2018

आलेख अनिल कुमार पाण्डेय देश में आयी उदारीकरण की बयार ने बहुत कुछ बदला है जिससे मीडिया भी अछूता नहीं रहा। टेलीविजन चैनलों की संख्या तकरीबन एक हजार की संख्या

वक्तव्य  (19 नवंबर 2017 को सिरसा में साहित्यिक सामाजिक सरोकारों को समर्पित संस्था संवाद, सिरसा द्वारा शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की स्मृति में ‘छत्रपति सम्मान 2017’ के अवसर पर राज्यसभा

कहानीJune 19, 2018

कहानी बचपन पूरे जीवन का माई-बाप होता है। बचपन के बाद अपना कद निकालता हुआ जीवन इसी बचपन की जुबान से ही बोलता-बतियाता है। इसके बावजूद इस नटखट बचपन का

आलेख बजरंग बिहारी तिवारी      भारतीय मानस धर्मप्राण है इसलिए भारतीय साहित्य अपने स्वभाव में अध्यात्मवादी, रहस्यवादी है; यह धारणा औपनिवेशिक दौर में बनी। राजनीति में साहित्य की दिलचस्पी आधुनिक

कहानीJune 19, 2018

कहानी ले परधान बीड़ी जला गांव के लगभग मध्य में बने मकान के सामने वाले चबूतरे पर चीेकट तहमद-कमीज धारण किए ‘परधान’ अक्सर बैठा रहता। उसके पैरों की जूती कभी

कविताJune 19, 2018

अच्छी लड़कियां खिड़की से झांकती लड़कियां देखती है हंसती खिलखिलाती लड़कियों को चीखती चिल्लाती लड़कियों को भीड़ के आगे चलती आंदोलन करती लड़कियों को जोर जोर आवाज़  देकर उन्हें बुलाती

किसी समाज की संस्कृति, रहन-सहन, भोजन व वेशभूषा को वहां के जीवनयापन के साधन व वहां की जलवायु सर्वाधिक प्रभावित करती है। अस्तित्व के संघर्ष में उत्पन्न आवश्यक वस्तुएं कालांतर में सांस्कृतिक प्रतीकों व चिह्नों में तब्दील हो जाया करती हैं। मानव समाज इन्हें अपनी पहचान से जोड़ लेता है। समाज विशेष की वेशभूषा ने इस सांस्कृतिक सफर को तय किया है। गर्मी-सर्दी से बचने के लिए तथा काम करते वक्त सिर ढकने वाला कपड़ा कब पुरुषों की इज्जत व स्त्रिायों की लाज का प्रतीक बन जाएगा। कब यह सामन्ती ठसक का रूप लेकर उत्पीड़न का प्रतीक बन जाएगी। महासिंह पूनिया का ‘पगड़ी’ पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित कर रहे हैं।

बचपन के दिन बण कै पाळी रोज सबेरे सिमाणै म्हैं जाया करते। डांगरां नैं हांक-हांक कै घास-फूस भरपेट चराया करते। बैठ खेत के डोळे ऊपर भजन ईश्वर के गाया करते। दोपहरी म्हैं जब भूख लागती शीशम तळै गंठे रोटी खाया करते। दूसरे के खेत म्हैं बड़ ज्यांदी भैस झट मोड़ के ल्याया करते। सच कहूं सूं मैं सुण ले ‘विनोद’ बचपन के वे दिन सबनै भाया करते। विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’   Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on

लघु कथाJune 19, 2018

आशा मन ही मन उस ईश्वर का धन्यवाद कर रही थी कि उसे एक खुद्दार पति मिला है। वह अपनी खुशी को भुलाकर रजत के साथ मां के कंगन और झुमके देने चल पड़ी।

गजलJune 18, 2018

जो लिखते फिरते हैं एक-इक मकां पे नाम अपना उन्हें बता दो कि इक दिन हिसाब भी होगा रात का वक़्त है संभल के चलो ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो गर बदल सकता है औरों की तरह चेहरा बदल ले वरऩा इस बहरूपियों के शहर से फ़ौरन निकल ले

शिमलाः  मई, 2018ः कला, भाषा, संस्कृति एवं समाज सेवा को समर्पित संस्था ‘नवल प्रयास‘ द्वारा 12 मई को शिमला स्थित दयानंद पब्लिक स्कूल के सभागार में एक दिवसीय राज्य स्तरीय

रिपोर्ट                 गांव नन्हेड़ा स्थित राजकीय प्राथमिक पाठशाला के सुंदर प्रांगण में 31जनवरी को गुरू रविदास जयंती के उपलक्ष्य में देस हरियाणा सृजनशाला में ‘गुरू रविदास के सपनों का समाज’

रिपोर्ट कुरुक्षेत्र स्थित महात्मा ज्योतिबा फुले सावित्री बाई फुले पुस्तकालय एवं शोधकेन्द्र में 3 जनवरी 2018 को देस हरियाणा द्वारा भारत की पहली शिक्षिका एवं समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले जयंती

अरुण कुमार कैहरबा अक्सर शिक्षा को लेकर सरकारी स्कूलों पर तोहमतें लगाई जाती हैं। अनेक खूबियों के बावजूद सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की तुलना में कमतर बताया जा रहा

आलेख ज्ञान प्रकाश विवेक देश का विभाजन एक न भूलने वाली घटना थी। यह एक ऐसी त्रासदी थी, जिसने भूगोल ही नहीं, अवाम को भी तकसीम करके रख दिया। जो

लेख दीपंचद्र निर्मोही आरक्षण की अवधारणा का जन्म जातियोंं के जन्म से ही जुड़ा लगता है। जाति-प्रथा के अंकुर वैदिक-काल में ही फूटते देखे जा सकते हैं। ऋग्वेद के पुरुष

बहुत से लोग इन आंदोलनों से हुए नुक्सान को देखकर यह भी कहने लगे हैं कि आरक्षण ही समस्या की जड़ है इसे समाप्त कर देना चाहिए। लेकिन यह विचार सामाजिक न्याय के बिल्कुल खिलाफ है। आरक्षण को तब तक समाप्त न किया जाए जब तक कि जब तक ये वर्ग खुली प्रतिस्पर्धा करने के लिए सक्षम न हो जाएं और अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों का केंद्रीय और राज्य सरकार की सेवाओं के सभी कैडर में उनका प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात के बराबर न पहुंच जाए।

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