देस हरियाणा

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◊ प्रो.  सूरजभान   पिछले एक दौर में अपनी विरासत के बारे में हमारी चेतना बहुत कमजोर पड़ी है। हम काफी हद तक अपने इतिहास के बेहतर पहलुओं को भूलते

Soldiers marching with rifles and flag beside historic fort at sunset

प्रो सूरजभान  भारत में इस वर्ष 1857 के राष्ट्रीय विद्रोह की 150वीं सालगिरह मनाई जा रही है। इस विद्रोह को देसी और विदेशी इतिहासकारों ने अपनी – अपनी दृष्टियों से

7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन 09 Jan

विविधJuly 18, 2018

स्मृति शेष मास्टर सतबीर द्वारा गाए सांग व किस्से भगत सिंह,  सुभाष चन्द्र बोस, उधम सिंह, अंजना पवन, नल दमयन्ती, वीजा सोरठ, चापसिंह, जयमल फत्ता, पिंगला भरथरी, जानी चोर, शाही

सामयिकJuly 10, 2018

                गत वर्षों ने भारतीय किसानों के भीतर दर्शनीय जागृति एवं संगठन शक्ति की असाधारण बाढ़ देखी है। यही नहीं कि उसने देश के सभी सार्वजनिक तथा जनतांत्रिक आंदोलनों में

सामयिकJuly 10, 2018

आलेख हमारा प्रदेश कृषि प्रधान है। प्रदेश की जनसंख्या का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा कृषि के कार्य में संलग्न है। यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि होने

 कविता शहर में कर्फ्यू है सब घरों में घुस जाएं इक ऐलान अचानक फैल जाता है। घरों में रहने वाले ओर भीतर हो जाते हैं। शहर में कर्फ्यू है सेना

कविता जात कैसी होती है उसका रंग कैसा होता है उसकी पहचान क्या होती रूप कैसा होता है कितनी बड़ी होती दृश्य या अदृश्य गुमान, गर्व या घमण्ड या फिर

कविता स्वाहा सब कुछ स्वाहा, धर्म ग्रंथों मंत्रों, पोथी पत्रों हर कर्म क्रिया संस्कार और हर मंत्रोचारणोपरांत। स्वाह से बनती है राख! राख में क्या है भीड़ द्वारा जलाए गए

कविता बाहुबली हर बार दिखाते हैं अपनी ताकत बताते हैं अपने मंसूबे बेकसूरों की गर्दनों पर उछल कूद करके हर बार कहते हैं मर्यादाएं मिट रही हैं संस्कृति सड़ रही

कविता बस! मजूरी मांगने की हिमाकत की थी उसने। एक एक कर सामान फैंका गया बाहर! नन्हें हाथों के खिलौने, टूटा हुआ चुल्हा, तवा-परात, लोहे का चिमटा, तांसला मैले कुचैले

कविताJuly 9, 2018

कविता ये लाशें जो जमीन पर अस्त व्यस्त पडी हैं कुछ क्षण पहले ये हंस खेल रहे थे मारने से पहले इन्हें, घर से बुलाया गया था ये मां जो

कविताJuly 9, 2018

कविता काठ का मन काठ का तन काठ सा जीवन काठ सी बेजान ख्वाहिशें । टक-टक ठुकती कींल एक एक चाहत में। काठ की हसरतें, संवेदना शून्य ,काठ सी। जमती,गलती

हरियाणवी ग़ज़ल बाळक हो गए स्याणे घर मैं। झगड़े नवे पुराणे घर मैं। आए नवे जमाने घर मैं। ख्याल लगे टकराणे घर मैं। मैं जिन तईं समझाया करता। लागे वैं

हाय-हाय रै जमींदारा, मेरा गात चीर दिया सारा। ( दयाचंद मायना) पिछले बीस-पच्चीस सालों से खेती-किसानी का संकट निरंतर गहराता जा रहा है। हताश किसान-आत्महत्याओं का सिलसलिा थम नहीं रहा। सरकारें,

  पठनीय पुस्तक कृषि संकट और खासतौर से किसान आत्महत्याओं के बारे में काफी कुछ लिखा जा रहा है। सरकारी रिपोर्टें और टीवी अखबार जहां एक ओर किसानों की आत्महत्याओं

इतिहासJuly 8, 2018

इतिहास ◊ प्रो सूरजभान सतनामी सम्प्रदाय में जाट, चमार, खाती आदि छोटी जातियों के लोग शामिल थे। परन्तु उन्होंने अपने जातिगत भेद मिटा दिए थे। वे सादा भोजन करते और

सुरेन्द्र पाल सिंह – आज देश में कृषि के संकट की चर्चा हो रही है। आप इसे कैसे परिभाषित करते हैं? इस संकट के क्या कारक हैं? योगेन्द्र यादव –

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