गजल

9Articles

हरियाणवी ग़ज़ल बाळक हो गए स्याणे घर मैं। झगड़े नवे पुराणे घर मैं। आए नवे जमाने घर मैं। ख्याल लगे टकराणे घर मैं। मैं जिन तईं समझाया करता। लागे वैं

सांस्कृतिक हलचल ‘आबिद आलमी’ (‘आबिद’ यानी तपस्वी, और ‘आलमी’ यानी इस दुनिया का), अपना यह तख़ल्लुस यानी कवि-नाम रखा था अपने वक़्त के जाने-माने शिक्षक और हरियाणा में शिक्षक-आंदोलनों के

गजलJune 20, 2018

ग़ज़ल हमारी रूह में शामिल था जि़न्दगी की तरह अभी जो शख्स गया है इक अजनबी की तरह किसी ने बनके समन्दर बिछा दिया खुद को मैं उसमें घुल गया

गजलJune 18, 2018

जो लिखते फिरते हैं एक-इक मकां पे नाम अपना उन्हें बता दो कि इक दिन हिसाब भी होगा रात का वक़्त है संभल के चलो ख़ुद से आगे ज़रा निकल के चलो गर बदल सकता है औरों की तरह चेहरा बदल ले वरऩा इस बहरूपियों के शहर से फ़ौरन निकल ले

गजलJune 2, 2018

ग़ज़लें 1 हर तरफ ज़ुल्म है आतंक है तबाही है और सितम ये है कि रोने की भी मनाही है तू भले लाख छुपा ले तेरे गुनाहों को वो जो

बात करती हैं नज़र, होंठ हमारे चुप हैं. यानि तूफ़ान तो भीतर हैं, किनारे चुप हैं. उनकी चुप्पी का तो कारण था प्रलोभन कोई और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं. बोलना भी है ज़रूरी साँस लेने की तरह उनको मालूम तो है, फिर भी वो सारे चुप हैं. भोर की वेला में जंगल में परिंदे लाखों है कोई खास वजह, सारे के सारे चुप हैं. जो हुआ, औरों ने औरों से किया, हमको क्या? इक यही सबको भरम जिसके सहारे चुप हैं.

“होंदा सी इत्थे शख्स़ इक सच्चा जाणे किदर गया जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई- जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई, साजिंदे पुछदे साज नूं नग़मा किदर गया, सब नीर होए गंदले, शीशे होए धुंधले इस तरह हर शख्स़ पुछदा हे, मेरा चेहरा किदर गया सिक्खां, मुसलमाना ते हिंदुआं दी पीड़ विच रब ढूंढदा फिरदा, मेरा बंदा किदर गया दुःख दी ज़मीं नू पुछदा अल्लाह किदर गया पातर नू जाण-जाण के पुछदी है आज हवा रेतां ते तेरा नाम लिख्या सी, जाणे किदर गया   

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?