मनीषा मणि

कविता


बदबू

किस ओर चला जा रहा है जीवन,
निरर्थक
व्यर्थ
लाचार
क्यों चेतना बांझ हो गई
और हो गई है
अपंग
मस्तिष्क में कूब निकल आया है
और हो गई हैं
पीप वाली फुंसियां
क्यों
कानों में राध पड़ गई है
और जिह्वा में छाले,
आंखें खुद को धृतराष्ट्र कहकर पुकार रही हैं
और
कोढ़ से गल गया शरीर,
और आती है बदबू….

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज – 57

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

Discover more from desharyana.in

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?