वे बरसने वाले हैं – उदय ठाकुर

कविता


वे बरसने वाले हैं

पंजाब से खबर आई है
सुरजीत ने अपना ट्रेक्टर
औने-पौने दामों में बेच दिया है
खेती के छोटे-मोटे औजार
कबाड़ी की रद्दी झोली में डाल दिए हैं
उसका हल आंगन में लावारिस पड़ा है
गाय-बैल मेले में बिकने को खड़े हैं
और वह आकाश में उड़ते हवाई जहाज की ओर निहार रहा है
वह वहां जाना चाहता है
जहां पेड़ों पर डालर फलते हैं

उसके घर के आंगन में पिता
चारपाई पर पसरे यह सब देख रहे हैं
पुरखों के पसीने से सिंची जमीन को चंडीगढ़ बनाना सोच रहे हैं
इसलिए वे बहरे नहीं मूक हो गए हैं
मां तंदूर की आग को बुझता देख रही है
रोटी सेकती है तो हाथ जलते हैं
वह अंधी नहीं विक्षिप्त हो गई है
खेत बंजर हो गए हैं
खलिहान में अकाल का साया मंडरा रहा है
अनाज घर में चूहे मरे पड़े हैं
चिडिय़ां गुरुद्वारों की शरण में हैं
कुत्ते अपने पूर्वज भेडिय़ों की तलाश में हैं

सुरजीत की तरह ही
जगजीत, मंजीत, हरप्रीत, गुरचरण, गुरुबख्श सभी
आकाश में उड़ते हवाई जहाज को देख रहे हैं
इन्हें रोटी नहीं पिज्जा की भूख है
लस्सी नहीं व्हिस्की की प्यास है
वे सोचते हैं सब कुछ वहीं है
मैं कहता हूं कहां है?
मक्की की रोटी, सरसों के साग का स्वाद
भाभी की मिस्सी रोटी की याद
माह की दाल में घी की फरियाद
रेहड़ी में छोले-भटूरे का संवाद
वह तू तू मैं मैं फिर बारात
वह तारों भरी रात
जिसके आगे वहां की क्या बिसात
यहां भंगड़ा, फिर झगड़ा, फिर मेल तगड़ा
बोल सुरजीत क्या मिलेगा वहां ऐसा लफड़ा
वहां क्या खास है
जिसकी तुझे आस है
वीर जी आकाश की ओर मत देख
वहां बादल काले और घने हैं
धरती की ओर निगाह फेर
यहां बादल पानी बरसाने को हैं।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 28

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