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प्रोफेसर सुभाष चंद्र सैनी

सुभाष चंद्र सैनी प्रोफेसर (सेवानिवृत) व संपादक देसहरियाणा सामाजिक कार्यकर्ता Contact Mission Group workshops Certificates

दशराज्ञ: भारतीय उपमहाद्वीप का प्रथम महायुद्ध और ‘भारत’ का उदय – असिन राजाराम

असिन राजाराम उर्फ गगनदीप सिंह दसराज्ञ युद्ध की पृष्ठभूमि इतिहास की धारा कभी खंडित नहीं होती; एक युग का अवसान अक्सर दूसरे, और भी अधिक निर्णायक युग की प्रस्तावना होता है। ऋग्वेद के सातवें मंडल में वर्णित ‘दशराज्ञ युद्ध’ (दस राजाओं का महायुद्ध) को यदि हम एक पृथक घटना के रूप में देखते हैं, तो […]

सावित्रीबाई फुले : जीवन जिस पर अमल किया जाना चाहिए

7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन 09 Jan 2018 7 जनवरी को दलित शोषण मुक्ति मंच (DSMM), दिल्ली ने भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्रीबाई फुले की 187वें जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का […]

मास्टर सतबीरः हरियाणवी संस्कृति का अनमोल रत्न

स्मृति शेष मास्टर सतबीर द्वारा गाए सांग व किस्से भगत सिंह,  सुभाष चन्द्र बोस, उधम सिंह, अंजना पवन, नल दमयन्ती, वीजा सोरठ, चापसिंह, जयमल फत्ता, पिंगला भरथरी, जानी चोर, शाही लकड़हारा, रूप बसन्त, सरवर नीर, कृष्ण सुदामा, कृष्ण जन्म, उतानपाद, भगत पूरणमल, हूर मेनका, चन्द्रहास, मोरध्वज, हीर रांझा, गोपीचन्द, चीर पर्व, विराट पर्व, सत्यवान सावित्री, लीलो चमन, पदमावत, चन्दकिरण, हीरामल जमाल, सेठ ताराचन्द, वीर विक्रमाजीत, नौरत्न, बणदेवी, वीर […]

सहजानंद सरस्वती – किसानों में चेतना

                गत वर्षों ने भारतीय किसानों के भीतर दर्शनीय जागृति एवं संगठन शक्ति की असाधारण बाढ़ देखी है। यही नहीं कि उसने देश के सभी सार्वजनिक तथा जनतांत्रिक आंदोलनों में पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा भाग लिया है; वरन एक श्रेणी की हैसियत से अपनी स्थिति को भी उसने समझा है। साथ ही, सामंतशाही और […]

अंजू – कृषि और महिलाएं

आलेख हमारा प्रदेश कृषि प्रधान है। प्रदेश की जनसंख्या का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा कृषि के कार्य में संलग्न है। यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। कृषि के कार्य में औरत और पुरुष की दोनोंं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।  कृषि के […]

मदन भारती – अनुष्ठान

 कविता शहर में कर्फ्यू है सब घरों में घुस जाएं इक ऐलान अचानक फैल जाता है। घरों में रहने वाले ओर भीतर हो जाते हैं। शहर में कर्फ्यू है सेना का बसेरा है शहर जंगल में तबदील है सबने जंगदार हथियार संभाल लिए हैं उपद्रवियों के सामने सशस्त्र सेना है उपद्रवी चिढ़ा रहे हैं अपनी […]

मदन भारती – जात

कविता जात कैसी होती है उसका रंग कैसा होता है उसकी पहचान क्या होती रूप कैसा होता है कितनी बड़ी होती दृश्य या अदृश्य गुमान, गर्व या घमण्ड या फिर एक सिरफिरा अहंकार जात एक जात होती है जात मतलब जन्म मतलब! जन्मजात इसे रंग रूप आकार से पहचानना एक नकल की परीक्षा का स्वांग […]

मदन भारती – राख

कविता स्वाहा सब कुछ स्वाहा, धर्म ग्रंथों मंत्रों, पोथी पत्रों हर कर्म क्रिया संस्कार और हर मंत्रोचारणोपरांत। स्वाह से बनती है राख! राख में क्या है भीड़ द्वारा जलाए गए मॉल में घड़ी जिसकी टिक-टिक बंद है राख अरमानों की सपनों की, जो निर्जीव है और उदासी बनकर दूर तक उड़ रही है। स्रोतः सं. […]

मदन भारती – नाक अभी बाकी है

कविता बाहुबली हर बार दिखाते हैं अपनी ताकत बताते हैं अपने मंसूबे बेकसूरों की गर्दनों पर उछल कूद करके हर बार कहते हैं मर्यादाएं मिट रही हैं संस्कृति सड़ रही है नाक कट रही है इज्जत पर बट्टा लग रहा है हम शर्मशार हैं हमारा सर्वोतम गोत्र लड़की ब्राह्मण है लड़का मनु व्यवस्था का अछूत […]

मदन भारती – नाक नहीं कटती

कविता बस्तियां जलातें हैं घर में कुकृत्य कर लेते हैं देवर का हक चलता है, जेठ तकता है, ससुर रौंदता है, बस्ती से लड़कियां उठा लेते हैं रेप करते हैं, रेत में दबा देते हैं आग लगा देते हैं जिन्दा भी जला देते हैं ऐसा करने से मर्यादाएं सकुशल रहती हैं गांव की शान बनी […]

मदन भारती – न्याय का रूप

कविता बस! मजूरी मांगने की हिमाकत की थी उसने। एक एक कर सामान फैंका गया बाहर! नन्हें हाथों के खिलौने, टूटा हुआ चुल्हा, तवा-परात, लोहे का चिमटा, तांसला मैले कुचैले वस्त्र सब बिखरा था गली में। कुछ डूबा था नाली में वही नाली, जिसमें बहता था पूरे गांव का मल मूत्र उल्टी पड़ी थी आम्बेडकर […]

मदन भारती – चुप्पी और सन्नाटा

कविता हम आगे जा रहे हैं या पीछे या फिर जंगल आज भी हमारा पीछा कर रहा है आधुनिकता के सब संसाधन इस्तेमाल कर रहे हैं 21वीं सदी के सभ्य सुसंस्कृत समाज में रहते भी हैं पर हम कर क्या रहे हैं कुटुम्ब के सदस्य को मार देतें हैं या बस्तियां बहिष्कृत कर देते हैं […]

मदन भारती – दो मांएं

कविता ये लाशें जो जमीन पर अस्त व्यस्त पडी हैं कुछ क्षण पहले ये हंस खेल रहे थे मारने से पहले इन्हें, घर से बुलाया गया था ये मां जो बदहवाश है जो फफककर रो रही है कह रही है मेरा इकलौता बी ए पास बेटा था वर्षों झूठन धोकर, पेट काटकर पाला था इसे […]

कविता वर्मा – काठ का मन

कविता काठ का मन काठ का तन काठ सा जीवन काठ सी बेजान ख्वाहिशें । टक-टक ठुकती कींल एक एक चाहत में। काठ की हसरतें, संवेदना शून्य ,काठ सी। जमती,गलती सपनों की फफूँदी से सड़ता ,गलता काठ सा मन। विश्वास की धूप को तरसता काठ, सीलन में सिसकता काठ , निरंतर चल पर काठ सा […]

रिसाल जांगड़ा – बाळक हो गए स्याणे घर मैं

हरियाणवी ग़ज़ल बाळक हो गए स्याणे घर मैं। झगड़े नवे पुराणे घर मैं। आए नवे जमाने घर मैं। ख्याल लगे टकराणे घर मैं। मैं जिन तईं समझाया करता। लागे वैं समझाणे घर मैं। छोटे-छोट्यां के बी पड़ग्ये, नखरे-नाज उठाणे घर मैं। छोट्टे मुंह तै बात बड़ी इब, लागे बोल्लण याणे घर मैं। बाळक तो  बस […]

सुभाष चंद्र – कर्ज माफी से कर्ज मुक्ति  न्यूनतम समर्थन मूल्य से निश्चित आय

हाय-हाय रै जमींदारा, मेरा गात चीर दिया सारा। ( दयाचंद मायना) पिछले बीस-पच्चीस सालों से खेती-किसानी का संकट निरंतर गहराता जा रहा है। हताश किसान-आत्महत्याओं का सिलसलिा थम नहीं रहा। सरकारें, नीति-निर्माता इस संकट से निकलने का कोई विश्वसनीय रास्ता सुझा नहीं पा रहे। विकल्पहीनता का संकट यहां साफ तौर पर दिख रहा है। जिस हरित-क्रांति […]

मदन भारती – हमारा हरियाणा

कविता   हमारा हरियाणा बडा प्यारा है जगत जहां से न्यारा है यहां के लोग बड़े कमाऊ हैं सीधे हैं, सच्चे हैं बहादुरी तो बस, एकदम कमाल की है संस्कृति निराली है अलग थलग भेष है यहां तो जोश ही जोश है सांस्कृतिक आयोजन का सरकारी भोंपू बेअटक बोल रहा था तभी आया कंधे पर […]

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