गतिविधियां

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मेरे पांव लडख़ड़ाते हैं लेकिन मेरे हौसलों को कभी लडख़ड़ाने नहीं दिया क्योंकि मुझे बहुत आगे तक जाना है इन्हीं पांवों से चलकर और बस आगे बढ़ते जाना है।’   

हलचल डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान, कुरुक्षेत्र द्वारा 26 जून 2016 को डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल स्मृति व्याख्यान-7 का आयोजन किया। विषय था ‘भारतीय लोकतंत्र: दशा और दिशा’। इसकी अध्यक्षता प्रो.

सांस्कृतिक हलचल 29 मई को यमुनानगर जिले का गांव टोपरा कलां गांव क्रांतिकारी जय भीम के नारों से गूंज उठा। जिधर देखिये उधर से जय भीम के नीले झंडों के

सांस्कृतिक हलचल 29 मई को यमुनानगर जिले का गांव टोपरा कलां गांव क्रांतिकारी जय भीम के नारों से गूंज उठा। जिधर देखिये उधर से जय भीम के नीले झंडों के

गजलJune 20, 2018

सांस्कृतिक हलचल ‘आबिद आलमी’ (‘आबिद’ यानी तपस्वी, और ‘आलमी’ यानी इस दुनिया का), अपना यह तख़ल्लुस यानी कवि-नाम रखा था अपने वक़्त के जाने-माने शिक्षक और हरियाणा में शिक्षक-आंदोलनों के

कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर जालैआपना वो चलै हमारे साथ                 20 जून 2016 को कबीर जयंती के अवसर पर ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से

  सांस्कृतिक हलचल 24 अप्रैल 2016 को रोहतक के डेंटल कॉलेज ऑडिटोरियम में अहमदाबाद की संस्था ‘लोकनाद’ से चारुल और विनय की गायक जोड़ी ने ‘सप्तरंग’ द्वारा आयोजित प्रोग्राम में

9 मई 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लेखक सोना चौधरी से छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों

  चर्चा-परिचर्चा प्रस्तुति – अमन वासिष्ठ 16 अप्रैल को ‘देस हरियाणा’ पत्रिका द्वारा रोहतक में एक परिचर्चा आयोजित की गयी। विषय था -‘हरियाणा में खेती किसानी -अंतर्विरोध और समाधान’। इस

  वक्तव्य प्रस्तुति- मुलख सिंह 15-16 मार्च को पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के पंजाबी विभाग की ओर से ‘शिक्षा और मानवीय विकास के संदर्भ में

वक्तव्य प्रस्तुति-  गुंजन कैहरबा इन्द्री (करनाल) स्थित रविदास मंदिर के सभागार में 10 अप्रैल, 2016 को बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर की 125वीं जयंती और महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती के

संवाद 7 अप्रैल 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका के तत्वाधान में ‘अपने लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें ‘आजादी मेरा ब्रांड’ की लेखिका अनुराधा बेनीवाल ने

संवाद 7 अप्रैल 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका के तत्वाधान में ‘अपने लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें ‘आजादी मेरा ब्रांड’ की लेखिका अनुराधा बेनीवाल ने

संवाद 16 मार्च 2016 को देस हरियाणा पत्रिका की ओर से ‘युवा पीढ़ी और शहीद भगत सिंह की विचारधारा’ विषय पर सेमीनार आयोजित किया, जिसमें शहीद भगत सिंह के भानजे

वक्तव्य  (19 नवंबर 2017 को सिरसा में साहित्यिक सामाजिक सरोकारों को समर्पित संस्था संवाद, सिरसा द्वारा शहीद पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की स्मृति में ‘छत्रपति सम्मान 2017’ के अवसर पर राज्यसभा

शिमलाः  मई, 2018ः कला, भाषा, संस्कृति एवं समाज सेवा को समर्पित संस्था ‘नवल प्रयास‘ द्वारा 12 मई को शिमला स्थित दयानंद पब्लिक स्कूल के सभागार में एक दिवसीय राज्य स्तरीय

रिपोर्ट                 गांव नन्हेड़ा स्थित राजकीय प्राथमिक पाठशाला के सुंदर प्रांगण में 31जनवरी को गुरू रविदास जयंती के उपलक्ष्य में देस हरियाणा सृजनशाला में ‘गुरू रविदास के सपनों का समाज’

रिपोर्ट कुरुक्षेत्र स्थित महात्मा ज्योतिबा फुले सावित्री बाई फुले पुस्तकालय एवं शोधकेन्द्र में 3 जनवरी 2018 को देस हरियाणा द्वारा भारत की पहली शिक्षिका एवं समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले जयंती

गतिविधियां आवाज़ें और चुप्पी मानव प्रदीप वशिष्ठ 27 नवम्बर, 2018 को कुरुक्षेत्र के  सावित्री बाई-जोतिबा फुले पुस्तकालय तथा शोध संस्थान में इंडियन फाउन्डेशन फॉर आर्ट  तथा देस हरियाणा ने एक

 कपिल बतरा पेंटिंग व पोस्टर मेकिंग स्पर्धा  23 फरवरी 2018 को हरियाणा सृजन उत्सव-2 के पहले दिन सुबह के सत्र में ‘देस हरियाणा, बदलता हरियाणा’ विषय पर पेंटिंग व पोस्टर

मीडियाJune 8, 2018

रिपोर्ट – अरुण कुमार कैहरबा कुरुक्षेत्र हरियाणा से मैं वाकिफ हूं। चंडीगढ़ में दो साल तक एक अखबार के ब्यूरो में मैंने काम किया है। कुरुक्षेत्र में किसी संगोष्ठी या

अनुराधा हरियाणा सृजन उत्सव के दौरान 25 फरवरी 2018 को ‘स्त्री सृजन संकल्पः उपलब्धियाँ और अनुभव’ विषय पर परिचर्चा हुई। युवा कवियत्री विपिन चौधरी, नाटक कलाकार व शिक्षाविद कमला, शोधार्थी

हम लोग जो अपने आप को प्रगतिशील कहते हैं, सेकुलर कहते हैं, उदारवादी कहते हैं या वामपंथी कहते हैं, हम जिस भाषा में बात करते हैं, जिस मुहावरे में बात करते हैं, उसमें कहीं ना कहीं गड़बड़ है। हमारी भाषा हमें जन मानस से जोड़ने का काम नहीं कर पा रही है। और सोचने पर महसूस हुआ कि मामला सिर्फ भाषा और मुहावरे का नहीं है, हमारी बुनियादी सोच में खोट है। हमारी सोच, हमारी अवधारणाएं और हमारे सिद्धांत सब एक यूरोपीय अनुभव की पैदाइश हैं और कहीं न कहीं उसी खांचे में कैद हैं। समतामूलक राजनीति को एक देशज विचार की जरूरत है।

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