कविता

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 कविता शहर में कर्फ्यू है सब घरों में घुस जाएं इक ऐलान अचानक फैल जाता है। घरों में रहने वाले ओर भीतर हो जाते हैं। शहर में कर्फ्यू है सेना

कविता जात कैसी होती है उसका रंग कैसा होता है उसकी पहचान क्या होती रूप कैसा होता है कितनी बड़ी होती दृश्य या अदृश्य गुमान, गर्व या घमण्ड या फिर

कविता स्वाहा सब कुछ स्वाहा, धर्म ग्रंथों मंत्रों, पोथी पत्रों हर कर्म क्रिया संस्कार और हर मंत्रोचारणोपरांत। स्वाह से बनती है राख! राख में क्या है भीड़ द्वारा जलाए गए

कविताJuly 9, 2018

कविता बाहुबली हर बार दिखाते हैं अपनी ताकत बताते हैं अपने मंसूबे बेकसूरों की गर्दनों पर उछल कूद करके हर बार कहते हैं मर्यादाएं मिट रही हैं संस्कृति सड़ रही

कविता बस्तियां जलातें हैं घर में कुकृत्य कर लेते हैं देवर का हक चलता है, जेठ तकता है, ससुर रौंदता है, बस्ती से लड़कियां उठा लेते हैं रेप करते हैं,

कविता बस! मजूरी मांगने की हिमाकत की थी उसने। एक एक कर सामान फैंका गया बाहर! नन्हें हाथों के खिलौने, टूटा हुआ चुल्हा, तवा-परात, लोहे का चिमटा, तांसला मैले कुचैले

कविताJuly 9, 2018

कविता ये लाशें जो जमीन पर अस्त व्यस्त पडी हैं कुछ क्षण पहले ये हंस खेल रहे थे मारने से पहले इन्हें, घर से बुलाया गया था ये मां जो

कविताJuly 9, 2018

कविता काठ का मन काठ का तन काठ सा जीवन काठ सी बेजान ख्वाहिशें । टक-टक ठुकती कींल एक एक चाहत में। काठ की हसरतें, संवेदना शून्य ,काठ सी। जमती,गलती

कविताJuly 9, 2018

कविता   हमारा हरियाणा बडा प्यारा है जगत जहां से न्यारा है यहां के लोग बड़े कमाऊ हैं सीधे हैं, सच्चे हैं बहादुरी तो बस, एकदम कमाल की है संस्कृति

कविता न जाने कब से रूढिय़ों में कै़द समाज काला पानी की जेल लगने लगा है। हमारा विश्वास है कि बंद कोठरियों के ताले तड़ातड़ टूटने लगेंगे। घायल हथेलियों से

साखी – पंडित और मशालची1, दोनों को सूझे नाहि। औरन को करे चांदनी, आप अंधेरा मांई।।टेक पंडित तुम कैसे उत्तम कहाये। चरण – एक जाइनि2 से चार बरन3 भे, हाड़

कविताJune 28, 2018

साखी – कहंता1 तो बहुत मिला, गहंता2 मिला न कोय। सो कहंता बहि जान दे, जो न गहंता होय।।टेक अमल करे सो पाई रे साधो भाई अमल करे सो पाई।

साखी – पूरब दिशा हरी को बासा, पश्चिम अल्लह मुकामा। दिल में खोजि दिलहि मा खोजे, इहै करीमा रामा।।टेक – म्हारो हीरो हेराणो कचरा में, पांच पचीस का झगड़न में।

साखी – सिद्ध भया तो क्या भया, चहु दिस1 फूटी बास2। अंदर वाके  बीज है, फिर उगन की आस3। टेक जोगी मन नी रंगाया, रंगाया कपड़ा। पाणी में न्हाई-न्हाई पूजा फतरा4,

संगत  साधु की, नित2 प्रीत कजे जाय। दुर्मति दूर बहावसि3, देखी सूरत जगाय।।टेक – कोई सफा न देखा दिल काचरण – बिल्ली देखी बगला देखा, सर्प जो देखा बिल का।

कविताJune 28, 2018

साखी -ऐसी मति संसार की, ज्यों गाडर1 का ठाठ2। एक पड़ा जेहि गाड़3 में, सबै जाहि तेहि बाट।।टेक -क्यों भूलीगी थारो देस दीवानी क्यों भूलीगी थारो देस हो-चरण -भूली मालन4

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