कविताJune 19, 2018

कविता आफत आफत का क्या पता हुज़ूर जाने कब टपक पड़े… राजधानी में एक बम धमाका हुआ और टूट पड़ी आफत,. रसोई में नमक ख़त्म और हो गया टंटा… क्या

कविताJune 19, 2018

कविता आइये देखें आइये देखें रोज़-रोज़ गिरावट की नित-नयी किस्में.. नाचती हुई नायिका के थिरकते हुए नितम्ब.. और नायक का निगेटिव शेड, हंसोकड़ी.. अवसर की चौपड़ सजाते लोग.. पसरते हुए

कविताJune 19, 2018

कविता विदाई समारोह एक विदाई समारोह देखा। निबटारा देखा। रिश्तों का पिछवाड़ा देखा। कुछ आंसू थे, बेखुशबू के फूल बिछे थे- पर जाते-जाते जाने वाले ने मुड़कर दोबारा देखा। कुछ

कविता वर्जीनिया को पढ़ते हुए एक अदद कमरे की ज़रूरत है एक प्याली कॉफ़ी जहां हो एक प्याली कॉफ़ी और कुछ किताबें कुछ देर का बेबाक लेटना कुछ अन्दरूनी कपड़े

आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता

विविधJune 19, 2018

हरियाणवी लोक कथा एक गादड़ था, वो अपणा चौंतरा बणा कै, लीप-पोत कै, साफ-सुथरा राख्या करता। वो अपणा रोब भोत राख्या करता। वो न्यू जाणता के सारा जंगल तेरा कह्या

कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों

 कविता बाप लिखवादे मियरो नाम, स्कूल में पढण कू जाउंगों। मैं करूगों कड़ी मिहनत बाप , स्कूल में फस्र्ट आउंगों।। बेकदइन बकरीन ने, मैं चराणकू नही जाउगों। दिवादे कापी किताब

आलेख                 अगर आंकड़ों की नजर से देखें तो 1991 से लागू उदारीकरण, वैश्वीकरण व नीजिकरण की नीतियों के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है।

रागनी हमेशा चिंता में गात रहा न्यूए दसौटा काट्या, कद आया बचपन कद आई जवानी कोन्या बेरा पाट्या (टेक)   घास ल्याणा सान्नी-सपान्नी सदा काम में हाथ बटाणा, गधे चराके,

 (प्रख्यात कथा लेखिका कृष्णा सोबती को वर्ष 2017 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।  प्रस्तुत है आज की देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर उनकी एक बेबाक टिप्पणी)

कविताJune 19, 2018

कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस

किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़

रागनी धरती बिन कोये धरती कारण धरै गये धार पै भूखमरी की भेंट चढे कोये धन की मारो-मार पै भूमि बिना बेचारा होज्या ना हो ठेल-ठिकाणा-ठोस दो गठड़ी पै हांड

कहानी जब छोरे गाभरू होंगे ताजा लेकर खाने वाले मजदूरों व गरीब किसानों के लिए भादवे का महीना तेरहवां महीना होता है। जहां खाते-पीते लोग सावण-भादवे में घूम-घूम कर आ

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