कविता डिजिटल चावल और चींटी चावल का दाना छोड़ कर चली गयी, और इस तरह से चावल का वो दाना सुदामा के हाथों कृष्ण को नसीब हुआ। बात यहीं ख़त्म
कविता डिजिटल चावल और चींटी चावल का दाना छोड़ कर चली गयी, और इस तरह से चावल का वो दाना सुदामा के हाथों कृष्ण को नसीब हुआ। बात यहीं ख़त्म
कविता बीस बरस की लड़की अब हो गयी तुम पूरे बीस बरस की लड़की ये उम्र है किसी का कहा ना मानने की अपनी कहने की, करने की हालांकि मुश्किल
कविता आफत आफत का क्या पता हुज़ूर जाने कब टपक पड़े… राजधानी में एक बम धमाका हुआ और टूट पड़ी आफत,. रसोई में नमक ख़त्म और हो गया टंटा… क्या
कविता सभ्यता के गुमान में सदियों पहले जब आदिमानव बिना कपड़ों के जीता था तब भी उसे एक मादा ने पैदा किया था। अपने शरीर में धारण किया था उसका
कविता आइये देखें आइये देखें रोज़-रोज़ गिरावट की नित-नयी किस्में.. नाचती हुई नायिका के थिरकते हुए नितम्ब.. और नायक का निगेटिव शेड, हंसोकड़ी.. अवसर की चौपड़ सजाते लोग.. पसरते हुए
कविता विदाई समारोह एक विदाई समारोह देखा। निबटारा देखा। रिश्तों का पिछवाड़ा देखा। कुछ आंसू थे, बेखुशबू के फूल बिछे थे- पर जाते-जाते जाने वाले ने मुड़कर दोबारा देखा। कुछ
कविता सच के हक़ में तुम जानते हो कि तुम दिमाग़ को मार नहीं सकते। तुम जानते हो कि एक दिन तुम्हारी बेशर्मी भी तुम्हारे किसी काम ना आयेगी। तुम
कविता वर्जीनिया को पढ़ते हुए एक अदद कमरे की ज़रूरत है एक प्याली कॉफ़ी जहां हो एक प्याली कॉफ़ी और कुछ किताबें कुछ देर का बेबाक लेटना कुछ अन्दरूनी कपड़े
कविता आती रहेंगीं बेटियां जीवन निरंतर चलता रहे ये उसूल कुदरत ने बनाया था और हमने वो उसूल तोड़ दिया। फिर कुछ यूं हुआ की हमने कुदरत को सुनना छोड़
आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता
हरियाणवी लोक कथा एक गादड़ था, वो अपणा चौंतरा बणा कै, लीप-पोत कै, साफ-सुथरा राख्या करता। वो अपणा रोब भोत राख्या करता। वो न्यू जाणता के सारा जंगल तेरा कह्या
कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों
कविता बाप लिखवादे मियरो नाम, स्कूल में पढण कू जाउंगों। मैं करूगों कड़ी मिहनत बाप , स्कूल में फस्र्ट आउंगों।। बेकदइन बकरीन ने, मैं चराणकू नही जाउगों। दिवादे कापी किताब
आलेख अगर आंकड़ों की नजर से देखें तो 1991 से लागू उदारीकरण, वैश्वीकरण व नीजिकरण की नीतियों के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है।
रागनी हमेशा चिंता में गात रहा न्यूए दसौटा काट्या, कद आया बचपन कद आई जवानी कोन्या बेरा पाट्या (टेक) घास ल्याणा सान्नी-सपान्नी सदा काम में हाथ बटाणा, गधे चराके,
(प्रख्यात कथा लेखिका कृष्णा सोबती को वर्ष 2017 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। प्रस्तुत है आज की देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर उनकी एक बेबाक टिप्पणी)
संस्मरण सोमैया इस संसार में बिल्कुल अकेला था। उसे न तो अपनी मां की याद थी और न बाप की। गांव के बड़े-बूढ़ों से जो कुछ सुनता था, उसे ही
कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस
किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़
पंछी भर इक नई परवाज़ भर इक नई परवाज़ पंछी! भर इक नई परवाज़ जितने छोटे पंख हैं तेरे उतने लम्बे राह हैं तेरे तेरी राहों में आखेटक ने किया
यह एक कहानी है ….लेकिन आप सभी लोगों के लिए नहीं! आप में से केवल उन लोगों के लिए जो जीवन से प्यार करते हैं और जो आजाद
रागनी धरती बिन कोये धरती कारण धरै गये धार पै भूखमरी की भेंट चढे कोये धन की मारो-मार पै भूमि बिना बेचारा होज्या ना हो ठेल-ठिकाणा-ठोस दो गठड़ी पै हांड
कहानी जब छोरे गाभरू होंगे ताजा लेकर खाने वाले मजदूरों व गरीब किसानों के लिए भादवे का महीना तेरहवां महीना होता है। जहां खाते-पीते लोग सावण-भादवे में घूम-घूम कर आ
सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै कबीर ने झूठ के घटाटोप को भेदकर सच्चाई को पा लिया था, इसलिए उनको ‘रोना’ इस