साहित्य विमर्श

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आलेख अर्थशास्त्री, राजनेता, मंत्री लेखक, संविधान निर्माता  आदि सभी रूपों और परिस्थितियों में डा.आम्बेडकर ने किसान हित की अनदेखी नहीं की। वे समय-समय पर सभी रूपों में किसानों के कल्याण

मीडियाJune 29, 2018

व्यक्तित्व मैं तब साढ़े तीन बरस का था। सिडनी, मेरा भाई, मुझसे चार बरस बड़ा था। मां थिएटर कलाकार थीं, हम दोनों भाइयों को बहुत प्यार से लिटाकर थिएटर चली

आलेख सदानंद साही समय आ गया है कि हम भाषा के सवाल को गंभीरता से लें। भाषा मनुष्य होने की शर्त है। इसे सिर्फ अभिव्यक्ति, संपन्न और दरिद्र जैसे पैमाने

संवाद विश्वविख्यात भाषा वैज्ञानिक, दार्शनिक, वामपंथी लेखक नोम चोम्स्की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रांतिकारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के विकास को लेकर उनका यह साक्षात्कार विज्ञान पत्रिका

संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल

इतिहासJune 22, 2018

इतिहास के पन्नों से भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में 1857 व गदर-लहर दो महत्त्वपूर्ण सशस्त्र विद्रोह रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि दोंनों में हरियाणा क्षेत्र की उल्लेखनीय भूमिका रही है।

लोक कथाJune 21, 2018

लोक नायक गोगा जी कौन थे? जिनकी गाथा गांव-गांव आज भी गाई जाती है। आज के वक्त में, जबकि जातीय संघर्ष उबल रहे हैं, साम्प्रदायिकता उफान पर है। ऐसे में

कहानीJune 20, 2018

संस्मरण ललित कार्तिकेय का जन्म हरियाणा के सारन में हुआ। उन्होंने ‘हिलियम’, ‘तलछट का कोरस’, कहानी संग्रह, ‘सामने का समय’, आलोचना तथा देरिदा की ‘स्पेक्टर्स ऑफ माक्र्स’, सलमान रशदी के

आलेख महान लेखक प्रेमचंद के साहित्य से हर कोई परिचित है। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिकशक्तियों की टकराहट-संघर्ष-आंदोलन स्पष्टत: मौजूद हैं। विकास नारायण राय का प्रस्तुत विशेष आलेख प्रेमचंद की

परिचर्चा किसी व्यक्ति व समाज की बेहतरी में पुस्तकोंं की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन पुस्तक पठन-अध्ययन-मनन की संस्कृति पर मंडराते खतरे की चिंता निरंतर यत्र-तत्र सुनने में आती है। इस

9 मई 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लेखक सोना चौधरी से छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों

पठनीय पुस्तक दलित साहित्य के लिए यह शुभ संकेत है कि अब हिंदी में भी लगातार आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो रहीं हैं। रचना के साथ-साथ आलोचना का यह तादात्मय दलित

  वक्तव्य प्रस्तुति- मुलख सिंह 15-16 मार्च को पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के पंजाबी विभाग की ओर से ‘शिक्षा और मानवीय विकास के संदर्भ में

संवाद 7 अप्रैल 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका के तत्वाधान में ‘अपने लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें ‘आजादी मेरा ब्रांड’ की लेखिका अनुराधा बेनीवाल ने

संवाद 16 मार्च 2016 को देस हरियाणा पत्रिका की ओर से ‘युवा पीढ़ी और शहीद भगत सिंह की विचारधारा’ विषय पर सेमीनार आयोजित किया, जिसमें शहीद भगत सिंह के भानजे

आलेख ब्राह्मणवाद की विचारधारा ने श्रम-जन्य कर्मों का तिरस्कार करते हुए वर्णधर्मी व्यवस्था के अंतर्गत उत्पादनशील श्रेणियों का शोषण बनाए रखा है।  कबीर की वाणियों में इस ब्राह्मणिक विचारधारा का

आलेख कबीर दास मध्यकालीन भारत के प्रसिद्घ संत हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया तथा ब्राह्मणवादी धार्मिक आडम्बरों की आलोचना की। इनकी प्रसिद्घ रचनाएं ‘बीजक’ में

विश्व साहित्य बर्टाेल्ट ब्रेख्त (बर्टाेल्ट आयगन फ्रीडरिक ब्रेख्त) नि:संदेह 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। नाटक के क्षेत्र में उनका प्रभाव वैसा ही माना जा सकता

आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता

कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों

आलेख                 अगर आंकड़ों की नजर से देखें तो 1991 से लागू उदारीकरण, वैश्वीकरण व नीजिकरण की नीतियों के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है।

 (प्रख्यात कथा लेखिका कृष्णा सोबती को वर्ष 2017 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।  प्रस्तुत है आज की देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर उनकी एक बेबाक टिप्पणी)

मीडियाJune 19, 2018

आलेख अनिल कुमार पाण्डेय देश में आयी उदारीकरण की बयार ने बहुत कुछ बदला है जिससे मीडिया भी अछूता नहीं रहा। टेलीविजन चैनलों की संख्या तकरीबन एक हजार की संख्या

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