विनोद कुमार – डॉ. आम्बेडकर किसान नेता के रूप में

आलेख अर्थशास्त्री, राजनेता, मंत्री लेखक, संविधान निर्माता  आदि सभी रूपों और परिस्थितियों में डा.आम्बेडकर ने किसान हित की अनदेखी नहीं की। वे समय-समय पर सभी रूपों में किसानों के कल्याण हेतु वे समर्पित रहे।  हर वो व्यक्ति जिसमें जरा सी भी बौद्धिक ईमानदारी है डॉ. आम्बेडकर को किसान हितैषी नेता के रूप में मानेगा।  कृषि […]

स्टेज पर वह मां  की आखिरी रात थी संजीव ठाकुर

व्यक्तित्व मैं तब साढ़े तीन बरस का था। सिडनी, मेरा भाई, मुझसे चार बरस बड़ा था। मां थिएटर कलाकार थीं, हम दोनों भाइयों को बहुत प्यार से लिटाकर थिएटर चली जाती थीं। नौकरानी हमारी देखभाल किया करती थी। रोज रात को थिएटर से लौटकर मां हम दोनों भाईयों के लिए खाने की अच्छी-अच्छी चीजें मेज […]

सदानंद साही मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

आलेख सदानंद साही समय आ गया है कि हम भाषा के सवाल को गंभीरता से लें। भाषा मनुष्य होने की शर्त है। इसे सिर्फ अभिव्यक्ति, संपन्न और दरिद्र जैसे पैमाने लागू करना भी ठीक नहीं है। इन्हीं मान्यताओं के चलते हम अपनी भाषिक सम्पदा को गंवाते चले आ रहे हें। हमारे औपनिवेशिक प्रभुओं ने बताया […]

भाषा हमारे अस्तित्व का मूल – नोम चोम्स्की

संवाद विश्वविख्यात भाषा वैज्ञानिक, दार्शनिक, वामपंथी लेखक नोम चोम्स्की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रांतिकारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के विकास को लेकर उनका यह साक्षात्कार विज्ञान पत्रिका ‘डिस्कवर’ में 29 नवम्बर 2011 को प्रकाशित हुआ था। उनसे यह बातचीत  ‘डिस्कवर’ के संवाददाता वेलरी रॉस ने की थी। इसका अनुवाद वरिष्ठ लेखक-पत्रकार आशुतोष […]

हरिभजन सिंंह रेणु : भारतीय मिथकों  का कवि – पूरन मुदगल

संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल जल तक पहुंचने के लिए कई सीढिय़ां नीचे उतरना पड़ता है। उसने यही किया-मन के भीतर कविता के जल-स्रोत तक पहुंचने के लिए वह बहुत […]

सिंगापुर की गदरी फौजी बगावत में शहीद हुए हरियाणा के वीरों की सूची

इतिहास के पन्नों से भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में 1857 व गदर-लहर दो महत्त्वपूर्ण सशस्त्र विद्रोह रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि दोंनों में हरियाणा क्षेत्र की उल्लेखनीय भूमिका रही है। सिंगापुर में गदर लहर की प्रेरणा से ’15 फरवरी 1915 को पांचवीं लाईट पलटन’ द्वारा विद्रोह किया गया। इस विद्रोह को  कुचल दिया गया। गिरफ्तार […]

गोगा पीर की कथा और हमारा समाज – अमनदीप वशिष्ठ

लोक नायक गोगा जी कौन थे? जिनकी गाथा गांव-गांव आज भी गाई जाती है। आज के वक्त में, जबकि जातीय संघर्ष उबल रहे हैं, साम्प्रदायिकता उफान पर है। ऐसे में साहित्य,मनोविज्ञान,इतिहास या फिर समाजशास्त्र में रूचि रखने वालों को गोगा-कथा से क्या प्राप्त होगा? गोगा जी की कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं है। इस कहानी […]

ललित कार्तिकेयः एक अशांत अदीब की खामोश मौत – ज्ञान प्रकाश विवेक

संस्मरण ललित कार्तिकेय का जन्म हरियाणा के सारन में हुआ। उन्होंने ‘हिलियम’, ‘तलछट का कोरस’, कहानी संग्रह, ‘सामने का समय’, आलोचना तथा देरिदा की ‘स्पेक्टर्स ऑफ माक्र्स’, सलमान रशदी के उपन्यास ‘शरम’ तथा शिव के. कुमार के उपन्यास ‘तीन किनारों वाली नदी’ का अनुवाद किया। वे हरियाणा प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव रहे। ‘अथ’ पत्रिका […]

प्रेमचंद से दोस्ती- विकास नारायण राय

आलेख महान लेखक प्रेमचंद के साहित्य से हर कोई परिचित है। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिकशक्तियों की टकराहट-संघर्ष-आंदोलन स्पष्टत: मौजूद हैं। विकास नारायण राय का प्रस्तुत विशेष आलेख प्रेमचंद की विचारधारा को उनकी कहानियों के भीतर से समझने का उपक्रम है।   नमक का दरोगा यानी प्रेमचंद बकलम खुद                 मैने संक्षेप में ग्यारह वर्षीय […]

किताबें ज्ञान का प्रवेश द्वार हैं – परमानंद शास्त्री

परिचर्चा किसी व्यक्ति व समाज की बेहतरी में पुस्तकोंं की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन पुस्तक पठन-अध्ययन-मनन की संस्कृति पर मंडराते खतरे की चिंता निरंतर यत्र-तत्र सुनने में आती है। इस संस्कृति के अवसान का मतलब होगा मनुष्यता का क्षरण। यह भी सही है कि कोई भी संस्कृति स्वत: ही नहीं पनपती, उसे पौधों की तरह […]

पहली बार लेखक की हैसियत से – सोना चौधरी

9 मई 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लेखक सोना चौधरी से छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों ने संवाद किया। सोना चौधरी के तीन उपन्यास प्रकाशित हुए हैं, ‘पायदान’, ‘विचित्र’ और ‘गेम इन गेम’। इस अवसर पर साहित्यकर्मी व पूर्व आई पी […]

दलित साहित्य: एक अन्तर्यात्रा – कमलानंद झा

पठनीय पुस्तक दलित साहित्य के लिए यह शुभ संकेत है कि अब हिंदी में भी लगातार आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो रहीं हैं। रचना के साथ-साथ आलोचना का यह तादात्मय दलित साहित्य के स्थायित्व के लिए उत्साहवर्धक है। इन पुस्तकों  में दलित साहित्य पर पैनी, सचेत और गंभीर दृष्टि रखने वाले बजरंग बिहारी तिवारी की नयी […]

वर्तमान शिक्षा बालक को एक अच्छी मशीन बनाती है – प्रो. नन्द किशोर आचार्य

  वक्तव्य प्रस्तुति- मुलख सिंह 15-16 मार्च को पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के पंजाबी विभाग की ओर से ‘शिक्षा और मानवीय विकास के संदर्भ में मातृ भाषा का योगदान’ विषय पर दो- दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया । इस अवसर पर बीज वक्तव्य देते हुए आई आई आई […]

हमारी कल्चर व समाज सारा ही सेक्सुअल – कृष्ण बेनीवाल

संवाद 7 अप्रैल 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका के तत्वाधान में ‘अपने लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें ‘आजादी मेरा ब्रांड’ की लेखिका अनुराधा बेनीवाल ने भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने अपने अनुभव सांझा किए तथा उपस्थित लोगों के सवालों पर अपना दृष्टिकोण रखा। इस अवसर पर लगभग 180 लोग […]

उसूल और जिंदगी में से एक चुनना पड़ा तो मैं उसूल चुनूंगा – जगमोहन

संवाद 16 मार्च 2016 को देस हरियाणा पत्रिका की ओर से ‘युवा पीढ़ी और शहीद भगत सिंह की विचारधारा’ विषय पर सेमीनार आयोजित किया, जिसमें शहीद भगत सिंह के भानजे व क्रांतिकारी इतिहास के विशेषज्ञ प्रो. जगमोहन ने भगत सिंह के विचारों को ऐतिहासिक परिपे्रक्ष्य में रखते हुए वर्तमान संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता व युवा […]

मैं कासी का जुलहा बूझहु मोर गिआना – डा.सेवा सिंह

आलेख ब्राह्मणवाद की विचारधारा ने श्रम-जन्य कर्मों का तिरस्कार करते हुए वर्णधर्मी व्यवस्था के अंतर्गत उत्पादनशील श्रेणियों का शोषण बनाए रखा है।  कबीर की वाणियों में इस ब्राह्मणिक विचारधारा का निषेध किया गया है। दूसरे, कबीर ने वर्णधर्मी व्यवस्था के अंधविश्वास पूर्ण सिद्धांतों की तर्कहीनता को अनावृत किया है। तीसरे, उन्होंने श्रम की ब्राह्मणिक अवमानना […]

सांचि कहौं तो मारन धावै – डा. सुभाष चंद्र

आलेख कबीर दास मध्यकालीन भारत के प्रसिद्घ संत हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया तथा ब्राह्मणवादी धार्मिक आडम्बरों की आलोचना की। इनकी प्रसिद्घ रचनाएं ‘बीजक’ में संकलित ‘साखी’, ‘सबद’, और ‘रमैनी’ हैं।  कबीरदास के जन्म के बारे में समाज में कई तरह की बातें प्रचलित हैं। माना जाता है कि कबीरदास […]

ब्रेख्तः नाटक के अंत पर नहीं, प्रक्रिया पर ध्यान रहे – मीत

विश्व साहित्य बर्टाेल्ट ब्रेख्त (बर्टाेल्ट आयगन फ्रीडरिक ब्रेख्त) नि:संदेह 20वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में से एक हैं। नाटक के क्षेत्र में उनका प्रभाव वैसा ही माना जा सकता है जैसा कि नावल के क्षेत्र में काफ्का का। ब्रेख्त का जन्म 10 फरवरी 1898 को जर्मनी के बावेरिया प्रांत के ऑक्सबर्ग के उच्च-मध्य वर्गीय […]

गोदान के होरी का समसामयिक संदर्भ – आदित्य आंगिरस

आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता और भारतपरायणता के साथ स्वार्थपरता और बैठकबाजी, उसकी बेबसी और निरीहता का जीता जागता चित्र उपस्थित किया गया है जिसमें उसकी गर्दन जिस पैर के […]

घुमंतु जीवनः सिकलीगर समुदाय -अरूण कुमार कैहरबा

कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों के कारण आस-पास के लोग इन समुदायों को समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं करते। सरकार द्वारा भी इनके हुनर और कारीगरी की कद्रो-कीमत बढ़ाने […]

ईंट भट्ठा उद्योग : महिलाओं का जीवन एवं बाल श्रम – मुकेश कुमार

आलेख                 अगर आंकड़ों की नजर से देखें तो 1991 से लागू उदारीकरण, वैश्वीकरण व नीजिकरण की नीतियों के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है। लेकिन हमारे  हुक्मरान व अर्थशास्त्री इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे है कि वर्तमान आर्थिक प्रगति व विकास के पीछे देश की आधी आबादी महिलाओं, […]

देश का चेहरा धर्मनिरपेक्ष रहना चाहिए – कृष्णा सोबती

 (प्रख्यात कथा लेखिका कृष्णा सोबती को वर्ष 2017 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।  प्रस्तुत है आज की देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर उनकी एक बेबाक टिप्पणी) भारत में विभाजनकारी ताकतों द्वारा आए दिन ताजादम किया जाने वाला सांप्रदायिकता का चेहरा हर भारतीय नागरिक को चुनौती देता एक गंभीर खतरा है। यह […]

देख कबिरा रोया…डा. सुभाष चंद्र

सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै कबीर ने झूठ के घटाटोप को भेदकर सच्चाई को पा लिया था, इसलिए उनको ‘रोना’ इस बात पर आता था कि जिस आवाम की मेहनत से दुनिया रोशन है, उसकी हालत सबसे पस्त है। उन्होंने जान लिया था कि श्रम का […]

न्यू मीडिया से बदलती समाचारी दुनिया – अनिल कुमार पांडे

आलेख अनिल कुमार पाण्डेय देश में आयी उदारीकरण की बयार ने बहुत कुछ बदला है जिससे मीडिया भी अछूता नहीं रहा। टेलीविजन चैनलों की संख्या तकरीबन एक हजार की संख्या पार कर चुकी है। वहीं पत्र-पत्रिकाओं की संख्या लाखों में पहुंच रही है। इन सबके चलते ही सामाजिक जनसंवाद का बड़ी तेजी से विस्तार हुआ […]

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?