हरियाणवी कविता

10Articles

हरियाणवी ग़ज़ल बाळक हो गए स्याणे घर मैं। झगड़े नवे पुराणे घर मैं। आए नवे जमाने घर मैं। ख्याल लगे टकराणे घर मैं। मैं जिन तईं समझाया करता। लागे वैं

 हरियाणवी गजल यार छोड़ तकरार की बातां। आजा कर ले प्यार की बातां। एक सुपना-सा बणकै रह्गी, आपस के इतबार की बातां। आजादी म्हं भी जस की तस सैं, जबर

हरियाणवी कविता   आया फागण लागे नाचण, भरकै मस्ती का घूट होळी म्ह। नार गजबण चढ्या जोबण, सबनै करै शूट होळी म्ह।। बणाकै डान्डा बीच बगड़ म्ह, रोप्या कैर का

कविता नमस्ते भतेरा ढो लिया तेरी कल्चर का बोझ, इब चलाइए ट्रैक्टर रोज। आधी धरती आधा घर, पूरी पढ़ाई, बणु अफसर। देखणी मैंने दुनिया सारी, छोड़ दी या सरम की

कविताJune 19, 2018

कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में

कविताJune 19, 2018

 कविता बाप लिखवादे मियरो नाम, स्कूल में पढण कू जाउंगों। मैं करूगों कड़ी मिहनत बाप , स्कूल में फस्र्ट आउंगों।। बेकदइन बकरीन ने, मैं चराणकू नही जाउगों। दिवादे कापी किताब

बचपन के दिन बण कै पाळी रोज सबेरे सिमाणै म्हैं जाया करते। डांगरां नैं हांक-हांक कै घास-फूस भरपेट चराया करते। बैठ खेत के डोळे ऊपर भजन ईश्वर के गाया करते। दोपहरी म्हैं जब भूख लागती शीशम तळै गंठे रोटी खाया करते। दूसरे के खेत म्हैं बड़ ज्यांदी भैस झट मोड़ के ल्याया करते। सच कहूं सूं मैं सुण ले ‘विनोद’ बचपन के वे दिन सबनै भाया करते। विनोद वर्मा ‘दुर्गेश’   Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on

जुल्मी होया जेठ विनोद वर्मा ‘दुर्गेश ’ जुल्मी  होया  जेठ,  तपै  सै  धरती  सारी ताती  लू  के  महां,  जलै  से काया म्हारी। सूख गे गाम के जोहड़, ना आवै नहरां म्हैं पाणी

धर्मेन्द्र कंवारी की हरियाणवी कविता मोल की लुगाई रामफळ गेल या कै मुसीबत आई किल्ले तीन अर घरां चार भाई मां खाट म्ह पड़ी रोज सिसकै मन्नै बहू ल्यादौ, मन्नै आग्गा दिक्खै

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...