कविता शहर में कर्फ्यू है सब घरों में घुस जाएं इक ऐलान अचानक फैल जाता है। घरों में रहने वाले ओर भीतर हो जाते हैं। शहर में कर्फ्यू है सेना
कविता शहर में कर्फ्यू है सब घरों में घुस जाएं इक ऐलान अचानक फैल जाता है। घरों में रहने वाले ओर भीतर हो जाते हैं। शहर में कर्फ्यू है सेना
कविता जात कैसी होती है उसका रंग कैसा होता है उसकी पहचान क्या होती रूप कैसा होता है कितनी बड़ी होती दृश्य या अदृश्य गुमान, गर्व या घमण्ड या फिर
कविता स्वाहा सब कुछ स्वाहा, धर्म ग्रंथों मंत्रों, पोथी पत्रों हर कर्म क्रिया संस्कार और हर मंत्रोचारणोपरांत। स्वाह से बनती है राख! राख में क्या है भीड़ द्वारा जलाए गए
कविता बाहुबली हर बार दिखाते हैं अपनी ताकत बताते हैं अपने मंसूबे बेकसूरों की गर्दनों पर उछल कूद करके हर बार कहते हैं मर्यादाएं मिट रही हैं संस्कृति सड़ रही
कविता बस्तियां जलातें हैं घर में कुकृत्य कर लेते हैं देवर का हक चलता है, जेठ तकता है, ससुर रौंदता है, बस्ती से लड़कियां उठा लेते हैं रेप करते हैं,
कविता बस! मजूरी मांगने की हिमाकत की थी उसने। एक एक कर सामान फैंका गया बाहर! नन्हें हाथों के खिलौने, टूटा हुआ चुल्हा, तवा-परात, लोहे का चिमटा, तांसला मैले कुचैले
कविता हम आगे जा रहे हैं या पीछे या फिर जंगल आज भी हमारा पीछा कर रहा है आधुनिकता के सब संसाधन इस्तेमाल कर रहे हैं 21वीं सदी के सभ्य
कविता काठ का मन काठ का तन काठ सा जीवन काठ सी बेजान ख्वाहिशें । टक-टक ठुकती कींल एक एक चाहत में। काठ की हसरतें, संवेदना शून्य ,काठ सी। जमती,गलती
कविता हमारा हरियाणा बडा प्यारा है जगत जहां से न्यारा है यहां के लोग बड़े कमाऊ हैं सीधे हैं, सच्चे हैं बहादुरी तो बस, एकदम कमाल की है संस्कृति
कविता न जाने कब से रूढिय़ों में कै़द समाज काला पानी की जेल लगने लगा है। हमारा विश्वास है कि बंद कोठरियों के ताले तड़ातड़ टूटने लगेंगे। घायल हथेलियों से
साखी – एकै त्वचा हाड़ मूल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा। एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शुद्रा।।टेक साधौ, पांडे निपुन कसाई। चरण – बकरी मारि भेड़ी
कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर
कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की
कविता वनों की ओर जाना ही नहीं होता बनवास जब भी अकेलापन करता है उदास ख्यालों के कुरंग नाचते हैं चुप्पी देती है ताल उल्लू चीखते हैं बिच्छू डसते हैं
कविता आओ मेरे लाल मेरी आंखों के तारो! मैं अब तुम्हारी भूख तुम्हारी रुलाई सहन नहीं कर सकती लो यह रस्सी गर्दन में डालकर झूल जाओ इस पर सुख
कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं
बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन
गीत धरती पर फैला दो, ये प्यार का पैगाम लव तो लव है इसमें, जेहाद का क्या काम ऐ जवानों करो बगावत इस माहौल के खिलाफ मानवता के दुश्मनों को
कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही
कविता एक चुप्पी एक चुप्पी हवा को बहने नहीं देगी आज कोलाहल कोई छूट गया पीछे सांसों का चलना तो दूर धड़कन का संपन्दन तक जैसे विराम हो गया हो
कविता मैंने देखी एक लड़की आज मैंने एक लड़की देखी नदी किनारे पगडंडी पे इठलाती कान में ईयरफोन लगाए, संगीत पे लहराती लड़की देखी आज मैंने एक लड़की देखी। मेरे
कविता बाप लिखवादे मियरो नाम, स्कूल में पढण कू जाउंगों। मैं करूगों कड़ी मिहनत बाप , स्कूल में फस्र्ट आउंगों।। बेकदइन बकरीन ने, मैं चराणकू नही जाउगों। दिवादे कापी किताब
ओम प्रकाश ग्रेवाल व दिनेश दधीचि आबिद आलमी के ग़ज़ल-संग्रह ‘नये ज़ाविए’ का मुख्य स्वर सीधी टकराहट का, जोखिम उठाने का है। आबिद आलमी के लिए सृजनात्मकता की यह एक