कविता
तड़पता हुआ बचपन,
आसमान से बरसती आग,
चीथड़ों में बदलते इन्सान,
क्या यही सभ्यता है?
चीखता हुआ बचपन,
पैराशूट से उतरती मौत,
अंग भंग हुई तड़पती लिखें,
क्या यही सभ्यता है?
अनाथ होता बचपन
माँँ-बाप का छिनता साया,
चीखती हुई इनसानियत,
क्या यही सभ्यता है?
लहुलुहान होता बचपन,
तड़पते हुए मासूम जिस्म,
टूटती हुई निर्दोष सांसें,
क्या यही सभ्यता है?
बदहवास होता बचपन,
मुरझाती हुई मासूम कलियाँ,
सूखते हुए अधखिले फूल,
क्या यही सभ्यता है?
बिलखता हुआ बचपन,
उजड़ता हुआ सुन्दर सा चमन,
क्रूर होता दमन,
क्या यही सभ्यता है?
–सिद्दीक़ अहमद मेव