मदन भारती – जात

कविता


जात कैसी होती है
उसका रंग कैसा होता है
उसकी पहचान क्या होती
रूप कैसा होता है
कितनी बड़ी होती
दृश्य या अदृश्य
गुमान, गर्व या घमण्ड
या फिर
एक सिरफिरा अहंकार
जात एक जात होती है
जात मतलब जन्म
मतलब! जन्मजात
इसे रंग रूप
आकार से पहचानना
एक नकल की
परीक्षा का स्वांग है।
जात इतराने के खूब काम आती,
मन को बहुत भाती है,
इसके लिए न अक्ल,
और न शक्ल देखी जाती है
जात हिमायत की हिमाकत करती है
ये नाम चमकाने के काम आती है
तरक्की का पायदान भी है
और बुरे कर्म में मदद कर देती है।
भीड़ बनकर
जात कांड से पूर्व इठलाती है
इतराती है
और बाद में
गौरव गान करती है
अपने नशे में झूमती है
मतमस्त होकर।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 45

 

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