कविता
मुझे मत कहना
गर मैं
कविता करते-करते
शब्दों की जुगाली करने लगूं
और सभ्य भाषा बोलते-बोलते
बौराये शराबी की तरह
चिल्लाने लगूं
बेइखलाकी पर उतर जाऊं
तुम्हारे द्वार की ईंट
फेंकू तुम्हारी ही ओर।
तुम जो अरसे से
मेरे पैर की अंगुली को
रोंद रहे हो अपने जूतों तले
मेरे अंदर ठोक रहे हो
कुछ अनघड़ा सा
सभी एक नूर के जाये
मानव! यही कर्म लिखाए
फिर कैसा शिकवा
गर मानव, मानव को खाए?
उधेड़ते जाओ तुम
मेरी उम्र
परत दर परत
और चाहो कि मैं मौन रहूं
या फिर
कविता सरीखे शब्द कहूं
इससे पहले कि
मेरे
कलम जैसे हाथों में
नाखून उग आएं
और अंदर का जाग उठे
सोया हैवान
मेरी चीख सुनो
मेरी आवाज सुनो
पंजाबी से अनुवाद : गीता ‘गीतांजलि’
स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -22