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कविताJune 28, 2018

साखी – सात दीप नौ खण्ड में, सतगुरु फेंकी डोर। हंसा डोरी न चढ़े, तो क्या सतगुुरु का जोर।। टेक तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे। चरण – मैं

साखी – एकै त्वचा हाड़ मूल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा। एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शुद्रा।।टेक साधौ, पांडे निपुन कसाई। चरण – बकरी मारि भेड़ी

कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की

कविताJune 26, 2018

कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी

कविताJune 26, 2018

कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी

कविताJune 26, 2018

कविता वनों की ओर जाना ही नहीं होता बनवास जब भी अकेलापन करता है उदास ख्यालों के कुरंग नाचते हैं चुप्पी देती है ताल उल्लू चीखते हैं बिच्छू डसते हैं

कविताJune 26, 2018

कविता यह आपकी पहली जीत थी। आपने ढूंढ लिया मेरा विभीषण जैसा भाई। यह मेरी आखिरी हार थी आपने जान लिया मेरे भीतर का रहस्य। नाभि का अमृत बन गया

कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं

विविधJune 24, 2018

यदि तोर डाक सुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे। यदि केउ कथा न कय, ओरे ओ अभागा यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले ओरे तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा, एकला बोलो रे !ऑ यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओ अभागा! […]

कविताJune 24, 2018

संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल

कविताJune 21, 2018

कविता जिन माओं ने नहीं उठाये ये किताबों से भरे बैग कभी। आज सौभाग्यवश उन्हीें माओं को। मिला है मौका बैग उठाने का। गांव में इसी वर्ष जो इंग्लिस मीडियम

कविता मैंने चुने हैं कुछ ऐसे रास्ते जिनमें रीसते हैं रिश्ते परम्परा से अलग नई परम्परा के कुछ से भिन्न कुछ से खिन्न और ज्यादा इन्सानियत के! स्रोतः सं. सुभाष

बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन

बाल कविता मैं हूं गैस गुबारा भैया ऊंची मेरी उड़ान नदियां-नाले-पर्वत घूमूं फिर भी नहीं थकान बस्ती-जंगल बाग-बगीचे या हो खेत-खलिहान रुकता नहीं कहीं भी पलभर देखूं सकल जहान उड़ते-उड़ते

कविता पीड़ाओं में जो पैदा हुए पीड़ाओं में जिनका बचपन गुजरा पीड़ाओं में ही रखे जिसने जवानी की दहलीज पर कदम पीड़ाओं में ही रहकर समझा पीड़ाओं के कारण को

कविता न्यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते एकाएक मेरी नजरें अटक गई उस विचित्र चित्र पर जो घूंघट में फूलों की माला पहने दे रही थी भाषण खड़ी थी विधायक बनने के लिए।

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