साखी – सात दीप नौ खण्ड में, सतगुरु फेंकी डोर। हंसा डोरी न चढ़े, तो क्या सतगुुरु का जोर।। टेक तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे। चरण – मैं
साखी – सात दीप नौ खण्ड में, सतगुरु फेंकी डोर। हंसा डोरी न चढ़े, तो क्या सतगुुरु का जोर।। टेक तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे। चरण – मैं
साखी – माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर। कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर।।टेक – अवधू, भजन भेद है न्यारा।। चरण – क्या गाये
साखी – दौड़त-दौड़त दौड़िया, जहां तक मन की दौड़ दौड़ थका मन थिर2 हुआ, तो वस्तु ठौर की ठौर।।टेक – मौको कहां ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास। चरण
साखी – एकै त्वचा हाड़ मूल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा। एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शुद्रा।।टेक साधौ, पांडे निपुन कसाई। चरण – बकरी मारि भेड़ी
कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर
कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की
कविता मैंने तुम्हें कहा था न मत कर कबीर-कबीर और अब शहर के बाहर खड़ा रह अकेला। अपने फुंके घर का देख तमाशा हक सच की आवाज लगाता पंजाबी से
कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी
कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी
कविता वनों की ओर जाना ही नहीं होता बनवास जब भी अकेलापन करता है उदास ख्यालों के कुरंग नाचते हैं चुप्पी देती है ताल उल्लू चीखते हैं बिच्छू डसते हैं
कविता आओ मेरे लाल मेरी आंखों के तारो! मैं अब तुम्हारी भूख तुम्हारी रुलाई सहन नहीं कर सकती लो यह रस्सी गर्दन में डालकर झूल जाओ इस पर सुख
कविता यह आपकी पहली जीत थी। आपने ढूंढ लिया मेरा विभीषण जैसा भाई। यह मेरी आखिरी हार थी आपने जान लिया मेरे भीतर का रहस्य। नाभि का अमृत बन गया
कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं
यदि तोर डाक सुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे। यदि केउ कथा न कय, ओरे ओ अभागा यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले ओरे तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा, एकला बोलो रे !ऑ यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओ अभागा! […]
संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल
कविता जिन माओं ने नहीं उठाये ये किताबों से भरे बैग कभी। आज सौभाग्यवश उन्हीें माओं को। मिला है मौका बैग उठाने का। गांव में इसी वर्ष जो इंग्लिस मीडियम
कविता मैंने चुने हैं कुछ ऐसे रास्ते जिनमें रीसते हैं रिश्ते परम्परा से अलग नई परम्परा के कुछ से भिन्न कुछ से खिन्न और ज्यादा इन्सानियत के! स्रोतः सं. सुभाष
बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन
बाल कविता मैं हूं गैस गुबारा भैया ऊंची मेरी उड़ान नदियां-नाले-पर्वत घूमूं फिर भी नहीं थकान बस्ती-जंगल बाग-बगीचे या हो खेत-खलिहान रुकता नहीं कहीं भी पलभर देखूं सकल जहान उड़ते-उड़ते
गीत धरती पर फैला दो, ये प्यार का पैगाम लव तो लव है इसमें, जेहाद का क्या काम ऐ जवानों करो बगावत इस माहौल के खिलाफ मानवता के दुश्मनों को
कविता पीड़ाओं में जो पैदा हुए पीड़ाओं में जिनका बचपन गुजरा पीड़ाओं में ही रखे जिसने जवानी की दहलीज पर कदम पीड़ाओं में ही रहकर समझा पीड़ाओं के कारण को
कविता लिखना केवल लिखने तक न रह जाये सीमित सोच, सकपकाता है ये मन कहना सिर्फ कहने तक न रह जाए निमित सोच, कचकचाता है ये मन सोचना सिर्फ सोचने
कविता न्यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते एकाएक मेरी नजरें अटक गई उस विचित्र चित्र पर जो घूंघट में फूलों की माला पहने दे रही थी भाषण खड़ी थी विधायक बनने के लिए।
कविता हां और शायद भी मुश्किल है। किसी चीज को बनाना उसे संवारना व निखारना और फिर उससे भी ज्यादा मुश्किल है। उसे संजो कर रखना। हम ये जानते हैं।