कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते
कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते
कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के इन्सान में भी
कविता खतरनाक होता है सिर्फ अपने लिए जीना और सब तरह की बेपरवाही उससे भी खतरनाक है आधार से कट जाना सिर्फ अपनी ही बात करना पर सबसे खतरनाक होता
कविता कर दिये गए थे हाथ तेरे पीले होते-होते किशोर बिना जाने तेरी मंशा शायद नहीं था पता तुझे अर्थ इस गृह बन्धन का वो बिखरी-बिखरी खुशियां वो रिश्ते की
तुम चुप रहो कोई बात नहीं लेकिन मैं चुप रहूं। ये अच्छी बात नहीं। क्योंकि मेरा चुप रहना तोड़ सकता है। आपकी खामोशी जिसकी नहीं है जरूरत शायद अभी। स्रोतः
कविता कितना सुंदर, दर्द भरा व निराला है शब्दों का खेल इस प्राणी जगत में अगर शब्द न होते तो कुछ न होता ज्ञान, संज्ञान से हम होते अनभिज्ञ न
कविता क्यों मढ़ देते हो तुम दोष बार-बार उस अन्जान पर जिसने नहीं सुनी कभी ज्ञान की बात जिसने नहीं पढ़ी कभी ज्ञानवर्धक किताब जो नहीं बैठी कभी ज्ञानी पुरुषों
कविता चीरती बेजान हवाएं तोड़ती सलाखें लांघती दुर्गम पहाड़ चूमती शिखर मुस्कराएंगी गाएंगी खिलखिलाएंगी बेटियां कब…? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on
कविता कभी बरबादी के गम में डूबे लाचार, बेबसी का घूंट पीते बूढ़े कभी दुर्याेधन की महत्वाकांक्षा का शिकार धृतराष्ट्र बन जाते बूढ़े कभी द्रोण कभी भीष्म की तरह मूक
कविता एक रात सपने में मेरे, ‘बाबा साहेब’ आये। दासता से मुक्ति के, मंत्र तीन बताये। पहला मंत्र बड़ा सरल, शिक्षा की तुम करो पहल, शिक्षित बन हर बाधा को,
कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही
कविता तुम्हारे घर के किवाड़ जानती हूं तुम्हारे घर की ओर मुड़ते हुए मुझे नहीं सोचना चाहिए कि मुझे तुम्हारे घर की ओर मुडऩा है, तुम्हारी दहलीज पर आकर नहीं
कविता झरना अनंत कालों से बहता झरना इतना शांत कभी नहीं देखा ऐसा क्या हुआ? कि – न जल के गिरने का शोर सुनता है और न बहने का। स्रोतः
कविता यदि लड़की भी होती मनुष्य लड़की को हक नहीं होता प्रेम करने का लेकिन, आते-जाते, घूमते-फिरते, छिपते-छिपाते कपड़े छत पर सुखाते-उतारते भी प्राय: हो ही जाता है प्रेम कहीं
कविता एक चुप्पी एक चुप्पी हवा को बहने नहीं देगी आज कोलाहल कोई छूट गया पीछे सांसों का चलना तो दूर धड़कन का संपन्दन तक जैसे विराम हो गया हो
कविता नमस्ते भतेरा ढो लिया तेरी कल्चर का बोझ, इब चलाइए ट्रैक्टर रोज। आधी धरती आधा घर, पूरी पढ़ाई, बणु अफसर। देखणी मैंने दुनिया सारी, छोड़ दी या सरम की
कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में
कविता उस दिन ना जाने शहर को अचानक क्या हो गया दिन का उजाला तो हुआ ना सड़कों पर अखबार वाले लड़के ना ही पार्कों की तरफ जाते लोग गली
युद्ध जो आ रहा है युद्ध जो आ रहा है पहला युद्ध नहीं है इससे पहले भी युद्ध हुए थे। पिछला युद्ध जब खत्म हुआ तब कुछ विजेता बने और
कविता अधबने फूल की हिमायत में उस स्कूल में बहुत से चित्र थे एक बच्चा चिंतित था क्यूंकि होमवर्क पूरा नहीं था एक बच्चे को ज़ोर की भूख लगी थी
कविता डिजिटल चावल और चींटी चावल का दाना छोड़ कर चली गयी, और इस तरह से चावल का वो दाना सुदामा के हाथों कृष्ण को नसीब हुआ। बात यहीं ख़त्म
कविता बीस बरस की लड़की अब हो गयी तुम पूरे बीस बरस की लड़की ये उम्र है किसी का कहा ना मानने की अपनी कहने की, करने की हालांकि मुश्किल
कविता आफत आफत का क्या पता हुज़ूर जाने कब टपक पड़े… राजधानी में एक बम धमाका हुआ और टूट पड़ी आफत,. रसोई में नमक ख़त्म और हो गया टंटा… क्या