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कविताJune 20, 2018

कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते

कविताJune 20, 2018

कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के इन्सान में भी

कविता इन ऊंची इमारतों में उन मोटी दीवारों में कब तक रखोगे कैद उन्हें जो जानती है दीवारों में कैद करने वालों को स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त

कविताJune 20, 2018

कविता कर दिये गए थे हाथ तेरे पीले होते-होते किशोर बिना जाने तेरी मंशा शायद नहीं था पता तुझे अर्थ इस गृह बन्धन का वो बिखरी-बिखरी खुशियां वो रिश्ते की

तुम चुप रहो कोई बात नहीं लेकिन मैं चुप रहूं। ये अच्छी बात नहीं। क्योंकि मेरा चुप रहना तोड़ सकता है। आपकी खामोशी जिसकी नहीं है जरूरत शायद अभी। स्रोतः

कविता क्यों मढ़ देते हो तुम दोष बार-बार उस अन्जान पर जिसने नहीं सुनी कभी ज्ञान की बात जिसने नहीं पढ़ी कभी ज्ञानवर्धक किताब जो नहीं बैठी कभी ज्ञानी पुरुषों

कविता कभी बरबादी के गम में डूबे लाचार, बेबसी का घूंट पीते बूढ़े कभी दुर्याेधन की महत्वाकांक्षा का शिकार धृतराष्ट्र बन जाते बूढ़े कभी द्रोण कभी भीष्म की तरह मूक

कविता एक रात सपने में मेरे, ‘बाबा साहेब’ आये। दासता से मुक्ति के, मंत्र तीन बताये। पहला मंत्र बड़ा सरल, शिक्षा की तुम करो पहल, शिक्षित बन हर बाधा को,

कविताJune 20, 2018

कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही

कविताJune 19, 2018

कविता तुम्हारे घर के किवाड़ जानती हूं तुम्हारे घर की ओर मुड़ते हुए मुझे नहीं सोचना चाहिए कि मुझे तुम्हारे घर की ओर मुडऩा है, तुम्हारी दहलीज पर आकर नहीं

 कविता झरना अनंत कालों से बहता झरना इतना शांत कभी नहीं देखा ऐसा क्या हुआ? कि – न जल के गिरने का शोर सुनता है और न बहने का। स्रोतः

कविताJune 19, 2018

 कविता यदि लड़की भी होती मनुष्य लड़की को हक नहीं होता प्रेम करने का लेकिन, आते-जाते, घूमते-फिरते, छिपते-छिपाते कपड़े छत पर सुखाते-उतारते भी प्राय: हो ही जाता है प्रेम कहीं

 कविता एक चुप्पी एक चुप्पी हवा को बहने नहीं देगी आज कोलाहल कोई छूट गया पीछे सांसों का चलना तो दूर धड़कन का संपन्दन तक जैसे विराम हो गया हो

कविताJune 19, 2018

कविता नमस्ते भतेरा ढो लिया तेरी कल्चर का बोझ, इब चलाइए ट्रैक्टर रोज। आधी धरती आधा घर, पूरी पढ़ाई, बणु अफसर। देखणी मैंने दुनिया सारी, छोड़ दी या सरम की

कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में

कविताJune 19, 2018

युद्ध जो आ रहा है युद्ध जो आ रहा है पहला युद्ध नहीं है इससे पहले भी युद्ध हुए थे। पिछला युद्ध जब खत्म हुआ तब कुछ विजेता बने और

 कविता अधबने फूल की हिमायत में उस स्कूल में बहुत से चित्र थे एक बच्चा चिंतित था क्यूंकि होमवर्क पूरा नहीं था एक बच्चे को ज़ोर की भूख लगी थी

कविता आफत आफत का क्या पता हुज़ूर जाने कब टपक पड़े… राजधानी में एक बम धमाका हुआ और टूट पड़ी आफत,. रसोई में नमक ख़त्म और हो गया टंटा… क्या

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