आलेख भारत के राजनीतिक गठन में सैद्धांतिक स्तर पर भाषा को मुख्य आधार माना गया है, परन्तु वास्तविक रूप में ऐसा हो नहीं रहा। भाषा का शिक्षा व प्रशासन आदि
आलेख भारत के राजनीतिक गठन में सैद्धांतिक स्तर पर भाषा को मुख्य आधार माना गया है, परन्तु वास्तविक रूप में ऐसा हो नहीं रहा। भाषा का शिक्षा व प्रशासन आदि
कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर
कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की
कविता मैंने तुम्हें कहा था न मत कर कबीर-कबीर और अब शहर के बाहर खड़ा रह अकेला। अपने फुंके घर का देख तमाशा हक सच की आवाज लगाता पंजाबी से
कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी
कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी
कविता वनों की ओर जाना ही नहीं होता बनवास जब भी अकेलापन करता है उदास ख्यालों के कुरंग नाचते हैं चुप्पी देती है ताल उल्लू चीखते हैं बिच्छू डसते हैं
कविता गली-बाजारों में/निकलती है भीड़ कभी इस ओर से कभी दूसरे छोर से हाथों में बर्छे लिए और त्रिशूल उठाए- ‘अकाल’ ‘हरहर’ महादेव के जयकारों से कांपती है हवा दानवता
कविता आओ मेरे लाल मेरी आंखों के तारो! मैं अब तुम्हारी भूख तुम्हारी रुलाई सहन नहीं कर सकती लो यह रस्सी गर्दन में डालकर झूल जाओ इस पर सुख
कविता यह आपकी पहली जीत थी। आपने ढूंढ लिया मेरा विभीषण जैसा भाई। यह मेरी आखिरी हार थी आपने जान लिया मेरे भीतर का रहस्य। नाभि का अमृत बन गया
कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं
पर्यावरण देहात की मनोरम छटा में चार चांद लगाने वाले जोहड़ों का अस्तित्व खतरे में है। कभी लोकजीवन की अगाध श्रद्धा व आस्था के केंद्र रहे जोहड़ आज प्रदूषण के
फवाह की मारक शक्ति समाज को छिन्न-भिन्न कर सकती है, खून की नदियां बहा सकती है, तबाही का मन्जर और ना भरने वाले जख्मों को पैदा कर सकती है।हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन से पनपी सामाजिक दरार को पाटने के उद्देश्य से गठित किये गए सद्भावना मंच के राज्य सयोंजक के नाते मार्च और अप्रैल 2016 के राज्य भर में घूमते हुए अफवाह के खतरनाक चरित्र के व्यवहारिक पक्ष को समझने का मौका मिला। समझ में आया कि एक सामान्य घटना को अफवाह के माध्यम से अतिरंजित रूप में फैलाया जा सकता है और और जिसके भयंकर परिणाम निकल सकते हैं।
अक्सर सार्वजनिक स्थानों, बस स्टैंड व रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगते, होटल-ढाबों व कहीं बंधुवा मजदूर के रूप में काम करते हुए 'छोटू’ देखते हैंं। हमारी जिज्ञासु प्रवृत्ति कभी यह जानने के लिए प्रेरित नहीं हुई कि आखिर ये 'छोटू’ बने बच्चे हैं कौन? कहां से पैदा होते हैं? कभी दो कदम आगे बढ़कर उनसे दो बातचीत करने की कोशिश नहीं की। इनके प्रति एक ही धारणा बनी हुई है कि इनके माता-पिता पैसों के लालच में जान-बूझकर ये सब करवाते हैं। लेकिन सभी का केवल यह सच नहीं होता है।
चीजों का वायदा करके इन धोखेबाजों ने सत्ता हथिया ली। लेकिन वे झूठे हैं, वे अपना वायदा पूरा नहीं करते, वे कभी नहीं करेंगे। तानाशाह खुद को आजाद कर लेते हैं, लेकिन जनता को गुलाम बना देते हैं। हम दुनिया को आजाद करने की लड़ाई लड़ें...राष्ट्रीय बाड़ों को हटा देने की लड़ाई, लोभ, नफरत व असहिष्णुता को उखाड़ फैंकने की लड़ाई! एक ऐसी दुनिया के लिए लड़ें, जहां विज्ञान और उन्नति हम सबके लिए खुशियां लेकर आए। सैनिकों, लोकतंत्र के नाम पर हम सब एक हो जाएं।
हरियाणवी गजल यार छोड़ तकरार की बातां। आजा कर ले प्यार की बातां। एक सुपना-सा बणकै रह्गी, आपस के इतबार की बातां। आजादी म्हं भी जस की तस सैं, जबर
कहानी आज हरखू मिस्त्री सुबह-सवेरे चार बजे ही जाग नहा-धोकर, बेटे के ब्याह में समधियाने से भेंट में मिला सफेद ल_े का कुरता, पायजामा पहिन, सिर में ढेर सारा सरसों
यदि तोर डाक सुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे। यदि केउ कथा न कय, ओरे ओ अभागा यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले ओरे तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा, एकला बोलो रे !ऑ यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओ अभागा! […]
संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल
सम्पादकीय के बहाने हरियाणा राज्य का पचासवां साल हैं। हरियाणा की बहुत सी उपलब्धियां हैं और विभिन्न क्षेत्रों में कई कीर्तिमान भी स्थापित किए हैं। यह साल हरियाणा के लिए
इतिहास के पन्नों से भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में 1857 व गदर-लहर दो महत्त्वपूर्ण सशस्त्र विद्रोह रहे हैं। दिलचस्प बात ये है कि दोंनों में हरियाणा क्षेत्र की उल्लेखनीय भूमिका रही है।
कविता जिन माओं ने नहीं उठाये ये किताबों से भरे बैग कभी। आज सौभाग्यवश उन्हीें माओं को। मिला है मौका बैग उठाने का। गांव में इसी वर्ष जो इंग्लिस मीडियम
कविता मैंने चुने हैं कुछ ऐसे रास्ते जिनमें रीसते हैं रिश्ते परम्परा से अलग नई परम्परा के कुछ से भिन्न कुछ से खिन्न और ज्यादा इन्सानियत के! स्रोतः सं. सुभाष