यार छोड़ तकरार की बातां – कर्मचंद ‘केसर

 हरियाणवी गजल

यार छोड़ तकरार की बातां।
आजा कर ले प्यार की बातां।

एक सुपना-सा बणकै रह्गी,
आपस के इतबार की बातां।

आजादी म्हं भी जस की तस सैं,
जबर जुल्म अत्याचार की बातां।

अखबारां  की बणी सुरखियां,
बलात्कार, दुराचार की बातां।

सूई का के काम ओड़ै सै,
जड़ै चलैं तलवार की बातां।

लोगां नैं उलझाकै राक्खैं,
बाब्यां के दरबार की बातां।

बूढिय़ा बोली छोड़ बहू इब,
नां छेड़ै नसवार की बातां।

सारे देस म्हं  फैल रह्यी सैं,
जालिम भरस्टाचार की बातां।

लोभ लालच टैंशन म्हं उलझी,
हंसी खुशी अर प्यार की बातां।

बजुरगां गेल्यां चली गई सैं,
वैं सांझे परिवार की बातां।

इब कौन सुणैगा तेरी-मेरी,
चाल रह्यी सरकार की बातां।

दिमाग खराब करैं माणस का,
बेमतलब बेकार की बातां।

बनड़ी नैं लाग्गैं सैं प्यारी,
होण आले भरतार की बातां।

मतलब के इस दौर म्हं ‘केसर’
कौण करै  ब्यौहार की बातां।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर- अक्तूबर 2016), पेज- 53

 

Leave a Reply

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

Discover more from desharyana.in

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading