सम्पादकीय के बहाने

हरियाणा राज्य का पचासवां साल हैं। हरियाणा की बहुत सी उपलब्धियां हैं और विभिन्न क्षेत्रों में कई कीर्तिमान भी स्थापित किए हैं। यह साल हरियाणा के लिए अपनी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने व उत्सव मनाने का अवसर है, वहीं अपने समाज की कमजोरियों को पहचानने का अवसर भी है। यदि हरियाणा के पचासवें साल का उत्सव स्टेज के रंगारंग कार्यक्रमों, अखबारों में सरकारी विज्ञापनों, इवेंट-प्रबंधकों द्वारा खुशहाली दर्शाते-बखानते मेगा कार्यक्रमों, तथा कुछ लोगों को पुरस्कारों तक सिमटकर रह गया तो हम अवश्य ही आत्ममूल्यांकन एक अवसर गंवा देगें।

 पचासवां साल कुछ सवाल पूछ रहा है। अपने समाज में गड़बड़ता लिंग-अनुपात किस बीमारी का लक्षण है। धार्मिक प्रतीकों के लिए लोग मनुष्यों की हत्या करने लगते हैं। विज्ञान व डिजीटल तकनीक के युग में लोग अपनी समस्याओं के निदान के लिए बाबाओं के आशीर्वाद-चमत्कार, ओझाओं की भभूत-झाड़े, गुरुओं के गंडे-ताबीज पर भरोसा क्यों कर रहे हैं। मानव विकास के सूचकांक तथा आर्थिक विकास के सूचकांक में गहरी खाई के क्या कारण हैं।

 शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मुहैया करवाने वाले प्रतिष्ठानों की हालत दिनों-दिन खस्ता क्यों होती जा रही है। गांव अपने बाशिंदों को रोजगार नहीं दे पा रहे और शहर उन्हें ओट नहीं रहे। गांव-शहरों के दुत्कारे लोग प्रवासी-शरणार्थियों की तरह रहने पर विवश क्यों हैं।  एक तरफ समृद्धि के अंबार तो  दूसरी तरफ घोर कंगाली क्यों है। धर्म व जाति के आधार पर प्रशासनिक पक्षपात और भेदभाव किस सामाजिक बीमारी का लक्षण है।

पचास साल से जो काम उपेक्षित है – वह है हरियाणा के सांस्कृतिक-निर्माण का। संतों-सूफियों, पीरों-फकीरों की उदार परंपराओं तथा हाली पानीपती, बालमुकुन्द गुप्त जैसे आधुनिक संस्कृतिकर्मियों की चेतना से संपर्क स्थापित करते हुए ही यह संभव है। जाहिर है कि ये काम सिर्फ नैतिक अपील से होने वाले नहीं हैं, बल्कि इसके लिए संस्थागत तौर पर कदम उठाने की जरूरत है। स्वाभाविक है कि ये कदम व्यक्तिगत तौर पर नहीं, बल्कि राज्य व सरकार ही उठा सकती हैं।

                फरवरी के महीने में सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में दाखिले में आरक्षण के लिए हरियाणा में हुए हिंसक आंदोलन पर फिलहाल तो रोक लगी है। इससे हुए नुक्सान व इसके कारणों को जानने के लिए सरकारी तौर पर बने ‘प्रकाश सिंह आयोग’ तथा नागरिक पहल से बने ‘जन आयोग’ की रिपोर्ट भी सार्वजनिक दायरे में है। लेकिन आरक्षण का मुद्दा अभी समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि इस हिंसक आंदोलन ने आरक्षण के सवाल को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

                वर्ग-स्वार्थों के कारण आरक्षण हमेशा से ही विवादास्पद विषय रहा है। भारतीय समाज में आरम्भ से ही समाज के उच्च वर्गों ने ज्ञान, सत्ता और संपति को अपने लिए वर्ण-जाति के आधार पर आरक्षित रखा।  अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए कठोर कायदों, रिवाजों, नियमों, नैतिकता-मर्यादा की अवधारणा निर्मित की गई। आधुनिक काल में समाज के वंचित वर्ग के महात्मा जोतीराव फुले-डॉ आंबेडकर सरीखे विचारकों ने शोषणमूलक सामाजिक संरचना का गहराई से विश्लेषण किया और शिक्षा व सत्ता में उच्च वर्गों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए दलित-पिछड़े वर्गों की भागीदारी की मांग की।

                स्वतंत्रता के बाद सदियों से चली आ रही वंचनाओं को दूर करने, प्रशासन में भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों व जनजातियों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण-संस्थाओं में आरक्षण के लिए सैंविधानिक प्रावधान किए गए।

                अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण तो नहीं किया गया, लेकिन धारा 340 के अन्तर्गत उनके विकास के लिए कदम उठाने को कहा गया। इसी के मद्देनजर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने दो साल के गहन मंथन के बाद 30 मार्च, 1955 को रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसने पूरे देश में 2399 जातियों अथवा समुदायों को पिछड़े के तौर तथा इनमें से 837 समुदायों को अति पिछड़े के तौर पर चिह्नित किया।

                आयोग की रिपोर्ट से पांच सदस्यों ने खुले तौर पर असहमति प्रकट की तथा केन्द्र सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अध्यक्ष महोदय ने प्रस्तावना में रिपोर्ट की मूल भावना व निष्कर्षों से असहमति प्रकट की। केन्द्र सरकार ने इस रिपोर्ट को नकार दिया। केन्द्रीय स्तर पर कोई सूची बनाने और केन्द्रीय सेवाओं में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने से इनकार कर दिया।

                दिसम्बर 1978 में बी पी मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया। पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए मंडल आयोग ने सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक आधार पर 11 संकेतक चिन्हित किए। सामाजिक संकेतकों में प्रत्येक के लिए तीन अंक, शैक्षणिक संकेतकों में प्रत्येक के लिए 2 अंक तथा आर्थिक संकेतकों में प्रत्येक के लिए 1 अंक निर्धारित किया। कुल 22 अंकों में से जिस जाति को 11 अंक प्राप्त हुए उसे पिछड़े वर्ग की सूची में शामिल कर लिया गया। 31 दिसम्बर, 1980 को इस आयोग ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। अप्रैल 1982 में संसद के पटल पर प्रस्तुत की। लेकिन सरकार की ओर से इस पर कार्रवाई की कोई रुपरेखा इसके साथ नहीं थी। लम्बे संघर्ष व जद्दोजहद के बाद यह रिपोर्ट लागू हुई।

                योग्यता के भोंडे तर्क से, आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करके, समाज को विभाजित करने का भय दिखाकर, आरक्षण रहित वर्गों में ईष्र्या-द्वेष-डाह पनपने के भय, आरक्षण नीति से आरक्षित वर्गों को विशेष लाभ न पहुंचने तथा सच्चे हकदारों को आरक्षण का लाभ न मिल पाने आदि तर्कों का सहारा आरक्षण का विरोध किया जाता रहा है।

                जाति की बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग प्रथमत: देखने में  एकदम तार्किक, विवेकपूर्ण व प्रगतिशील विचार दिखाई देता है, लेकिन भला सा लगने वाला यह आधार सामाजिक भेदभाव, दमन व उत्पीड़न की तो अनदेखी करता ही है। ज्यों ही इसके व्यावहारिक पक्ष पर विचार करते हैं, तो यह समाज के पिछड़े वर्गों को मिल रहे आरक्षण का विरोध स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है।

                भारतीय समाज में जाति सिर्फ व्यक्ति की पहचान के साथ नहीं जुड़ी, बल्कि शक्ति का स्रोत रही है। जाति यहां व्यक्ति का पेशा, खान-पान, काम-धंधों, धार्मिक-सांस्कृतिक रुचियों को नियंत्रित और संचालित करती रही है। जाति-व्यवस्था के पिरामिड में सबसे नीचे वाली जातियों को अधिकारों से वंचित रखा गया। उनके हिस्से में श्रम करना था, उसके श्रम के फलों का स्वाद सवर्ण जातियों ने अपने लिए रख छोड़ा था। जाति-व्यवस्था की सामाजिक-वर्जनाओं ने समाज के बहुत बड़े भाग को ज्ञान, सत्ता और संपति से वंचित रखा।

                आरक्षण-नीति के कारण शक्ति के स्रोतों में बंटवारा होना आरम्भ हुआ, तो विशेषाधिकार संपन्न वर्गों में त्राहि-त्राहि मच हुई है। अभी तक जो वर्ग जाति के आधार पर समाज की नियामतें भोग रहे थे, अब वे जाति के आधार पर बंटवारे को समाज को विभाजनकारी करार देकर आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करने लगे हैं।

                पिछड़ेपन की पहचान सिर्फ आर्थिक आधार पर ही नहीं की जा सकती, बल्कि सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक आधार पर भी जातियां और समुदाय पिछड़े होते हैं। यदि किसी एक श्रेणी के आधार पर पिछड़ा मानकर आरक्षण दे दिया जाए, तो समाज के जो वर्ग अथवा समुदाय अन्य शक्तिशाली होंगे तो वे वर्ग अथवा समुदाय ही आरक्षण का लाभ उठा पायेंगे। इसका परिणाम यह होगा कि अन्य मामलों में जो समुदाय पहले ही अपेक्षाकृत शक्ति-संपन्न हैं, वही फलेंगे-फूलेंगे।

                शिक्षण संस्थानों में आर्थिक आधार पर 15 प्रतिशत सीट आरक्षित हैं। महिलाओं के लिए भी बिना किसी जाति, धर्म, लिंग, नस्ल का भेदभाव किए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है।  कुछ अपवादों को छोड़कर, राज्य सरकार के अधीन सभी नौकरियां उसके अधिवासियों के लिए आरक्षित हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के बेटे/बेटियों/पोते/पोतियों के लिए, शारीरिक रूप से विकलांग, खेल हस्तियों के लिए भी शिक्षण-संस्थाओं में प्रवेश तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण के प्रावधान हैं।

                आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है यह एकांगी एवं भ्रांतिपूर्ण सोच पर गढ़ा गया तर्क है, और इसमें वर्गीय पूर्वाग्रह भी शामिल है। स्वतंत्रता के बाद अपनाई गई धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को बनाए रखने के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता की स्थितियों का निर्माण करना जरूरी था। संविधान निर्माताओं ने समाज के सभी वर्गों को प्रशासन में प्रतिनिधित्व देने तथा जातिगत पूर्वाग्रहों व जातिगत अलगाव को समाप्त करने के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था की थी।

                जो लोग समाज में जातिवाद को बढ़ता हुआ देख रहे हैं और उसका कारण आरक्षण को ठहरा रहे हैं, उन्होंने अपने परिवेश की ओर से आंखें बन्द कर रखी हैं। ध्यान देने की जरुरत है कि सन् 1991 के बाद  वैश्वीकरण की नीतियों से रोजगार-बाजार सिकुड़ा है। आर्थिक असमानता बढ़ी है। जातिवाद और असमानता का गहरा संबंध है। आर्थिक शोषण और असमानता का परिवेश जातिवाद पनपने के लिए बहुत ही मुफीद होता है। राजनीतिक पार्टियों के पास जनता के जीवन की बेहतरी के लिए कोई कारगर योजनाएं नहीं हैं। आज सत्ता प्राप्त करने वाले राजनीतिक दलों के लिए जाति के आधार पर जनता की गोलबंदी सबसे आसान और सुरक्षित रास्ता है। इसके लिए वे जाति के सम्मेलन करते-करवाते हैं। जाति के कथित नेताओं को राजनीतिक दलों में पदाधिकारी बनाया जाता है। टिकट देते वक्त क्षेत्र के जातीय समीकरणों का पूरा ख्याल रखा जाता है। जाति की धर्मशालाओं व अन्य संस्थाओं को खुलकर चन्दा दिया जाता है।

                कुलीन हितों के पोषकों का बहुत ही भोंडा तर्क है, कि आरक्षण शिक्षण-संस्थाओं व प्रशासन की योग्यता और गुणवत्ता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। इससे यह भ्रम पैदा करने की कोशिश करते हैं कि योग्यता और प्रतिभा उच्च वर्गों की बपौती है।  मेरिट या योग्यता का अवसरों की उपलब्धता से गहरा संबंध है। यदि किसी समाज को अवसर नहीं मिलेंगे तो उनमें वांछित योग्यता भी विकसित नहीं होती। जिस समाज को जो अवसर मिले, उन्होंने वैसा करने की योग्यता पैदा की। समाज के वंचित वर्गों को जब अवसर मिला, तो वे योग्यता की कसौटी पर खरे उतरे हैं।

                विशेषतौर पर जिस तरह की योग्यता की बात करते हैं। वह एक छलावा है। नौकरियों के लिए परीक्षाओं में सामान्य ज्ञान के नाम पर जो प्रश्न पूछे जाते हैं, वे आभिजात्य समाज से संबंध रखते हैं। आभिजात्य समाज की संस्कृति और जरूरतों की जानकारी को ही ज्ञान माने जाने वाली परीक्षा में पिछड़े तथा सामान्य वर्ग के ग्रामीण छात्र निश्चित रूप से शहरी आभिजात्य के मुकाबले में अच्छा नहीं कर सकते।

आरक्षण समान अवसर तथा कुछ वर्गों का वर्चस्व समाप्त करने का माध्यम हो न कि खोये हुए विशेषाधिकार और वर्चस्व स्थापित करने का।

इस अंक में टेकचंद की कहानी ‘मोलकी’  खरीदकर लाई वधुओं की पीड़ा को व्यक्त करती है। इन महिलाओं को पत्नी के हक नहीं मिलते, वे काम करने व सेक्स मशीन बनकर रह गई हैं। ललित कार्तिकेय की कहानी ‘हिलियम’ उपभोक्तावादी जीवन की विडम्बनाओं को उजागर करती है।

 उत्तराखंड त्रासदी पर केंद्रित ब्रह्मदत्त शर्मा के सद्य प्रकाश्य उपन्यास ‘ठहरे हुए पलों में’ का अंश है। सुशीला बहबलपुर व उर्मिल मोंगा की कविताएं, डा. आशुतोष व महेन्द्र सिंह ‘फकीर’ के गीत हैं। रणबीर सिंह दहिया, सत्यवीर नाहडिय़ा, मनोज पवार ‘मौजी’ की रागनियां हैं। रेनू शर्मा की लघुकथा है।

प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से उनकी विचारधारा को व्यक्त करता विकास नारायण राय का ‘प्रेमचंद से दोस्ती’ आलेख है। राजविन्द्र चंदी का ‘शहीद उधम सिंह’ के जीवन व बलिदान पर केंद्रित लेख है। हरियाणा के होनहार लेखक ललित कार्तिकेय पर केंद्रित संस्मरण ‘एक अशांत अदीब की खामोश मौत’ में ज्ञान प्रकाश विवेक ने ललित कार्तिकेय के जीवन-संघर्ष को रेखांकित किया है।

 ‘इतिहास के पन्नों से’ हरियाणा क्षेत्र के गदर आंदोलन के शहीदों व अन्य कठोर सजा प्राप्त स्वतंत्रता सेनानियों की सूची है।

‘लोकनायक’ गोगा पीर की कथा  की वर्तमान संदर्भों में प्रासंगिकता को अभिव्यक्त करता अमनदीप वासिष्ठ का आलेख है। आरक्षण के लिए हुए हिंसक आंदोलन के कारणों की पड़ताल करता सुरेन्द्र एस जोधका का लेख है। सांस्कृतिक-साहित्यिक हलचलों की रपट हैं। ‘धमाचौकड़ी’ में बी. मदन मोहन की कविताएं हैं। जैसा बना, अंक आपके हाथ में है …

सुभाष चंद्र

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016)

 

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