हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी

कविता

मनुष्य
जीवनभर
तलाशता है सीढ़ी
ताकि छू सके
कोई ऊंची चोटी

एक ऊंचाई के बाद
तलाशता है दूसरी सीढ़ी
औ’ हर ऊंचाई के बाद
नकारता है
पहली सीढ़ी

सीढ़ी है
जो नहीं नकारती
अपना धर्म-कर्म
वह फिर सेवा के लिए हाजिर होती है

यह अलग बात है
कहीं ‘सीढ़ी’ मैं हूं
कहीं ‘सीढ़ी’ तुम हो
कहीं ‘वह’ है और कहीं कोई और।

पंजाबी से अनुवाद : पूरन मुद्गल व मोहन सपरा

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -21

Leave a reply

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?