Prof. Subhash Chander

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत। जातिवाद, साम्प्रदायिकता, सामाजिक लिंगभेद के खिलाफ तथा सामाजिक सद्भभाव, साम्प्रदायिक सद्भाव, सामाजिक न्याययुक्त समाज निर्माण के लिए निरंतर सक्रिय। साहित्यिक, सांस्कृतिक व सामाजिक सवालों पर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन।लेखन, संपादन व अनुवाद की लगभग बीस पुस्तकों का प्रकाशन प्रकाशित पुस्तकेंः साझी संस्कृति; साम्प्रदायिकता; साझी संस्कृति की विरासत; दलित मुक्ति की विरासतः संत रविदास; दलित आन्दोलनःसीमाएं और संभावनाएं; दलित आत्मकथाएंः अनुभव से चिंतन; हरियाणा की कविताःजनवादी स्वर; संपादनः जाति क्यों नहीं जाती?; आंबेडकर से दोस्तीः समता और मुक्ति; हरियणावी लोकधाराः प्रतिनिधि रागनियां; मेरी कलम सेःभगतसिंह; दस्तक 2008 व दस्तक 2009; कृष्ण और उनकी गीताः प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टि; उद्भावना पत्रिका ‘हमारा समाज और खाप पंचायतें’ विशेषांक; अनुवादः भारत में साम्प्रदायिकताः इतिहास और अनुभव; आजाद भारत में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगे; हरियाणा की राजनीतिः जाति और धन का खेल; छिपने से पहले; रजनीश बेनकाब। विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ाव। संपादक – देस हरियाणा हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा आलोचना क्षेत्र में पुरस्कृत।

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कविताJune 20, 2018

कविता न्यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते एकाएक मेरी नजरें अटक गई उस विचित्र चित्र पर जो घूंघट में फूलों की माला पहने दे रही थी भाषण खड़ी थी विधायक बनने के लिए।

कविताJune 20, 2018

कविता हां और शायद भी मुश्किल है। किसी चीज को बनाना उसे संवारना व निखारना और फिर उससे भी ज्यादा मुश्किल है। उसे संजो कर रखना। हम ये जानते हैं।

कविताJune 20, 2018

कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते

कविताJune 20, 2018

कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के इन्सान में भी

कविताJune 20, 2018

कविता खतरनाक होता है सिर्फ अपने लिए जीना और सब तरह की बेपरवाही उससे भी खतरनाक है आधार से कट जाना सिर्फ अपनी ही बात करना पर सबसे खतरनाक होता

कविता इन ऊंची इमारतों में उन मोटी दीवारों में कब तक रखोगे कैद उन्हें जो जानती है दीवारों में कैद करने वालों को स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त

कविता कर दिये गए थे हाथ तेरे पीले होते-होते किशोर बिना जाने तेरी मंशा शायद नहीं था पता तुझे अर्थ इस गृह बन्धन का वो बिखरी-बिखरी खुशियां वो रिश्ते की

कविताJune 20, 2018

तुम चुप रहो कोई बात नहीं लेकिन मैं चुप रहूं। ये अच्छी बात नहीं। क्योंकि मेरा चुप रहना तोड़ सकता है। आपकी खामोशी जिसकी नहीं है जरूरत शायद अभी। स्रोतः

कविताJune 20, 2018

कविता क्यों मढ़ देते हो तुम दोष बार-बार उस अन्जान पर जिसने नहीं सुनी कभी ज्ञान की बात जिसने नहीं पढ़ी कभी ज्ञानवर्धक किताब जो नहीं बैठी कभी ज्ञानी पुरुषों

आलेख महान लेखक प्रेमचंद के साहित्य से हर कोई परिचित है। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिकशक्तियों की टकराहट-संघर्ष-आंदोलन स्पष्टत: मौजूद हैं। विकास नारायण राय का प्रस्तुत विशेष आलेख प्रेमचंद की

परिचर्चा किसी व्यक्ति व समाज की बेहतरी में पुस्तकोंं की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन पुस्तक पठन-अध्ययन-मनन की संस्कृति पर मंडराते खतरे की चिंता निरंतर यत्र-तत्र सुनने में आती है। इस

ग़ज़ल हमारी रूह में शामिल था जि़न्दगी की तरह अभी जो शख्स गया है इक अजनबी की तरह किसी ने बनके समन्दर बिछा दिया खुद को मैं उसमें घुल गया

9 मई 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लेखक सोना चौधरी से छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों

कविता कभी बरबादी के गम में डूबे लाचार, बेबसी का घूंट पीते बूढ़े कभी दुर्याेधन की महत्वाकांक्षा का शिकार धृतराष्ट्र बन जाते बूढ़े कभी द्रोण कभी भीष्म की तरह मूक

कहानीJune 20, 2018

कहानी कहने को दिल्ली, पर दिल्ली-हरियाणा बार्डर से सटा गांव। बोली, बाना, रिवाज और लोग सब हरियाणवी। हल्की गर्मियों की सांझ चार बजे का समय है। मोहल्ले में सब अपने

कविताJune 20, 2018

कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही

पठनीय पुस्तक दलित साहित्य के लिए यह शुभ संकेत है कि अब हिंदी में भी लगातार आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो रहीं हैं। रचना के साथ-साथ आलोचना का यह तादात्मय दलित

हरियाणवी कविता   आया फागण लागे नाचण, भरकै मस्ती का घूट होळी म्ह। नार गजबण चढ्या जोबण, सबनै करै शूट होळी म्ह।। बणाकै डान्डा बीच बगड़ म्ह, रोप्या कैर का

  चर्चा-परिचर्चा प्रस्तुति – अमन वासिष्ठ 16 अप्रैल को ‘देस हरियाणा’ पत्रिका द्वारा रोहतक में एक परिचर्चा आयोजित की गयी। विषय था -‘हरियाणा में खेती किसानी -अंतर्विरोध और समाधान’। इस

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