चुप – सुशीला बहबलपुर

तुम चुप रहो
कोई बात नहीं
लेकिन
मैं चुप रहूं।
ये अच्छी बात नहीं।
क्योंकि मेरा चुप रहना
तोड़ सकता है।
आपकी खामोशी
जिसकी नहीं है
जरूरत शायद अभी।


स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016) पेज-28

 

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