तुम कबीर न बनना- हरभजन सिंंह रेणु
कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर बैठा कबीर कह रहा था तुम कबीर मत बनना। ये अक्षरों गोटियों का खेल त्याग और मेरे साथ ताणा बुन ध्यान दे घर का गुजारा […]
हरभजन सिंंह रेणु – प्रतिकर्म
कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की ईंट फेंकू तुम्हारी ही ओर। तुम जो अरसे से मेरे पैर की अंगुली को रोंद रहे हो अपने जूतों तले मेरे अंदर ठोक रहे हो […]
हरभजन रेणु सिंह – कहा था न
कविता मैंने तुम्हें कहा था न मत कर कबीर-कबीर और अब शहर के बाहर खड़ा रह अकेला। अपने फुंके घर का देख तमाशा हक सच की आवाज लगाता पंजाबी से अनुवाद : गीता ‘गीतांजलि’ स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -22
हरभजन सिंंह रेणु – वैश्वीकरण
कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी नजर के सामने नाचते गाते कहोगे हम आजाद हैं सोच भी सकते हैं। पंजाबी से अनुवाद : गीता ‘गीतांजलि’ स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, […]
हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी
कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी है जो नहीं नकारती अपना धर्म-कर्म वह फिर सेवा के लिए हाजिर होती है यह अलग बात है कहीं ‘सीढ़ी’ मैं हूं कहीं ‘सीढ़ी’ तुम […]
हरभजन सिंंह रेणु – बनवास
कविता वनों की ओर जाना ही नहीं होता बनवास जब भी अकेलापन करता है उदास ख्यालों के कुरंग नाचते हैं चुप्पी देती है ताल उल्लू चीखते हैं बिच्छू डसते हैं नाग रेंगते हैं आस-पास हम अपने भीतर के जंगल में पलों में वर्षों का भोग लेते हैं बनवास। पंजाबी से अनुवाद : पूरन मुद्गल व […]
हरिभजन सिंंह रेणु : भारतीय मिथकों का कवि – पूरन मुदगल
संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल जल तक पहुंचने के लिए कई सीढिय़ां नीचे उतरना पड़ता है। उसने यही किया-मन के भीतर कविता के जल-स्रोत तक पहुंचने के लिए वह बहुत […]