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कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की

कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी

                अक्सर हरियाणा में पंजाबी संस्था या विभाग को छोड़ कर और जितनी भी सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा जितनी भी भाषण व लेखन प्रतियोगिताएं होती हैं, उसमें अभिव्यक्ति का माध्यम सिर्फ हिन्दी या अंग्रेजी भाषा ही होता है, परन्तु पंजाबी भाषा के प्रति यह रवैया नकारात्मक होता है। जिसके कारण पंजाबी भाषी विद्यार्थी इस तरह की प्रतियोगिताओं में भाग लेने से वंचित रह जाते हैं।

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