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कविता मुझे मत कहना गर मैं कविता करते-करते शब्दों की जुगाली करने लगूं और सभ्य भाषा बोलते-बोलते बौराये शराबी की तरह चिल्लाने लगूं बेइखलाकी पर उतर जाऊं तुम्हारे द्वार की

कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी

कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं

कविताJune 24, 2018

संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल

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