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कविताJune 26, 2018

कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी

कविताJune 26, 2018

कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं

संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल

कविताJune 21, 2018

बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन

कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही

कविताJune 19, 2018

कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में

कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस

किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़

कविताJune 19, 2018

कविता बदबू किस ओर चला जा रहा है जीवन, निरर्थक व्यर्थ लाचार क्यों चेतना बांझ हो गई और हो गई है अपंग मस्तिष्क में कूब निकल आया है और हो

कविताJune 10, 2018

हमें लिखो स्याह न हो आने वाले दिन कवि ! इन दिनों के बारे में जरूर लिखो सबको मिले न्याय और सब हो अलहादकारी भेदभाव मिटे, कवि कुछ ऐसा लिखो

कविताJune 9, 2018

अन्त मंथन ये आबो हवा बेचैन सी लगती है मुझे आज रूह हर शख्स की इस शहर में बेदम सी लगती है मुझे आज लगता है खो गया है। उसका

उत्सव हरियाणा सृजन सिद्दीक अहमद मेव एक साथ इतने हैं रंग, देख के मैं तो रह गया दंग,, कोई गा रहा दफ पर यहां, कोई बजा रहा है मृदंग, उत्सव

कविताMay 24, 2018

हरियाणा सृजन उत्सव में 23 फरवरी को राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में दामिनी यादव ने अपनी माहवारी कविता सुनाई। इस तरह की कविताओं को आमतौर पर सुनाने का रिवाज नहीं है, लेकिन दामिनी ने आधी आबादी के अनुभव को जिन संवेदनशील शब्दों में प्रस्तुत किया और जिस गंभीरता से सुनाया था 500 के करीब मौजूद श्रोता अपने साथ इस कविता को लेकर गए. कविता का टेक्सट और दामिनी की ही आवाज में कविता आपके लिएः

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