हरभजन सिंंह रेणु – सीढ़ी
कविता मनुष्य जीवनभर तलाशता है सीढ़ी ताकि छू सके कोई ऊंची चोटी एक ऊंचाई के बाद तलाशता है दूसरी सीढ़ी औ’ हर ऊंचाई के बाद नकारता है पहली सीढ़ी सीढ़ी है जो नहीं नकारती अपना धर्म-कर्म वह फिर सेवा के लिए हाजिर होती है यह अलग बात है कहीं ‘सीढ़ी’ मैं हूं कहीं ‘सीढ़ी’ तुम […]
हरभजन सिंंह रेणु- ठीक कहा तुमने
कविता तुमने ठीक ही कहा है- जब हम तोड़ नहीं पाते अपने इर्द-गिर्द की अदृश्य रस्सियों के अटूट जाल, तब हम दार्शनिक हो जाते हैं। कहीं एकांत में लोकगीत नहीं रचते-गाते मंत्र जपते पढ़ते हैं, बंद कमरों में छिपकर शब्दों के हथियार घड़ते हैं, सिद्धांतों के घोड़ों पर सवार स्वयं से लड़ते स्वंय ही जीतते-हारते […]
हरिभजन सिंंह रेणु : भारतीय मिथकों का कवि – पूरन मुदगल
संस्मरण कविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल जल तक पहुंचने के लिए कई सीढिय़ां नीचे उतरना पड़ता है। उसने यही किया-मन के भीतर कविता के जल-स्रोत तक पहुंचने के लिए वह बहुत […]
चिड़िया – बी मदन मोहन

बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन में बिखरे दानों को चीं-चीं करते खा जाते शैतानी करते मनचाही मां के पीछे लग जाते पंक्ति बांध के चलते, जैसे रेल का इंजन छुक-छुक-छुक। […]
प्यार का पैगाम – महेंद्र सिंह ‘फकीर’
गीत धरती पर फैला दो, ये प्यार का पैगाम लव तो लव है इसमें, जेहाद का क्या काम ऐ जवानों करो बगावत इस माहौल के खिलाफ मानवता के दुश्मनों को करना कभी मत माफ भगत सिंह ने पिया था, पी लो वो ही जाम छुरी लहराने वाले क्यूं पा रहे सब मान फूल खिलाने वाले […]
तीन मंत्र – भूप सिंह ‘भारती’
कविता एक रात सपने में मेरे, ‘बाबा साहेब’ आये। दासता से मुक्ति के, मंत्र तीन बताये। पहला मंत्र बड़ा सरल, शिक्षा की तुम करो पहल, शिक्षित बन हर बाधा को, आसानी से दोगे कुचल। अछूत नहीं, अभिषेक बनो, बुरे नहीं, तुम नेक बनो, बिखरा-2 है दलित वर्ग, दूजा मंत्र तुम एक बनो। अंतिम मंत्र रखना […]
क्या यही सभ्यता है?- सिद्दीक़ अहमद मेव
कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही सभ्यता है? अनाथ होता बचपन माँँ-बाप का छिनता साया, चीखती हुई इनसानियत, क्या यही सभ्यता है? लहुलुहान होता बचपन, तड़पते हुए मासूम जिस्म, टूटती हुई […]
रास्सा – अनुराधा बेनीवाल
कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़े का सारा हिसाब जोड़ ले। एक-एक किस्त मैं आप पुगा दूंगी, तू बोझ मन्ने एकबे कहणा छोड़ दे। मेरे पैदा होए पे आह ना […]
वसीयत – संत राम उदासी
कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस बूर सरकंडे का आहों की आंच काफी तीली भी न जलाना एकबारगी ही जलकर मैं न चाहूं राख़ होना जब -जब ढलेगा सूरज कण -कण […]
किसको वतन कहूंगा? – संतराम उदासी
किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़ खींच दी शिव की जटाएं किसको किसका दफऩ कहूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा ये जिस्म तो मेरी बेटी-सा है ये कोई मेरी बहन के […]
पंछी भर इक नई परवाज़ – संतराम उदासी
पंछी भर इक नई परवाज़ भर इक नई परवाज़ पंछी! भर इक नई परवाज़ जितने छोटे पंख हैं तेरे उतने लम्बे राह हैं तेरे तेरी राहों में आखेटक ने किया है गर्द -गबार पंछी! भर इक नई परवाज़ जिस टहनी पर वास तेरा है उस टहनी का हाल बुरा है तेरे उडऩे से पहले कहीं […]
मनीषा मणि
कविता बदबू किस ओर चला जा रहा है जीवन, निरर्थक व्यर्थ लाचार क्यों चेतना बांझ हो गई और हो गई है अपंग मस्तिष्क में कूब निकल आया है और हो गई हैं पीप वाली फुंसियां क्यों कानों में राध पड़ गई है और जिह्वा में छाले, आंखें खुद को धृतराष्ट्र कहकर पुकार रही हैं और […]
ओम प्रकाश करुणेश
हमें लिखो स्याह न हो आने वाले दिन कवि ! इन दिनों के बारे में जरूर लिखो सबको मिले न्याय और सब हो अलहादकारी भेदभाव मिटे, कवि कुछ ऐसा लिखो कुछ इस तरह गुनगुनाओ कि होठों में ही दबी न रह जाए मजलूमों की आवाज गाओ अब इनके झमेले कवि अब ऐसे गीत सुनाओ तुफां […]
सुशीला बहबलपुर

अन्त मंथन ये आबो हवा बेचैन सी लगती है मुझे आज रूह हर शख्स की इस शहर में बेदम सी लगती है मुझे आज लगता है खो गया है। उसका कुछ वह चाहता है पाना फिर से बहुत कुछ पर देता नहीं दिखाई उसे कोई चिराग अपने आस-पास अब वह ढूंढ़ रहा है कोई चिंगारी […]
सिद्दीक अहमद मेव
उत्सव हरियाणा सृजन सिद्दीक अहमद मेव एक साथ इतने हैं रंग, देख के मैं तो रह गया दंग,, कोई गा रहा दफ पर यहां, कोई बजा रहा है मृदंग, उत्सव हरियाणा सृजन। कहीं कवि बिखेर रहे हैं रंग, कहीं हैं बच्चों के सब रंग,, हो रही विचारों की हैं जंग, है संस्कृतियों का ये संगम, […]
दामिनी यादव की कविताएं माहवारी और बिकी हुई कलम

हरियाणा सृजन उत्सव में 23 फरवरी को राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में दामिनी यादव ने अपनी माहवारी कविता सुनाई। इस तरह की कविताओं को आमतौर पर सुनाने का रिवाज नहीं है, लेकिन दामिनी ने आधी आबादी के अनुभव को जिन संवेदनशील शब्दों में प्रस्तुत किया और जिस गंभीरता से सुनाया था 500 के करीब मौजूद श्रोता अपने साथ इस कविता को लेकर गए. कविता का टेक्सट और दामिनी की ही आवाज में कविता आपके लिएः