गुम हो रहा देश का भविष्य – रामफल दयोरा

अक्सर सार्वजनिक स्थानों, बस स्टैंड व रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगते, होटल-ढाबों व कहीं बंधुवा मजदूर के रूप में काम करते हुए ‘छोटू’ देखते हैंं। हमारी जिज्ञासु प्रवृत्ति कभी यह जानने के लिए प्रेरित नहीं हुई कि आखिर ये ‘छोटू’ बने बच्चे हैं कौन? कहां से पैदा होते हैं? कभी दो कदम आगे बढ़कर उनसे दो बातचीत करने की कोशिश नहीं की।  इनके प्रति एक ही धारणा बनी हुई है कि इनके माता-पिता पैसों के लालच में जान-बूझकर ये सब करवाते हैं। लेकिन सभी का केवल यह सच नहीं होता है।

चिड़िया – बी मदन मोहन

बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन में बिखरे दानों को चीं-चीं करते खा जाते शैतानी करते मनचाही मां के पीछे लग जाते पंक्ति बांध के चलते, जैसे रेल का इंजन छुक-छुक-छुक। […]

 क्या यही सभ्यता है?- सिद्दीक़ अहमद मेव

कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही सभ्यता है? अनाथ होता बचपन माँँ-बाप का छिनता साया, चीखती हुई इनसानियत, क्या यही सभ्यता है? लहुलुहान होता बचपन, तड़पते हुए मासूम जिस्म, टूटती हुई […]

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?