कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही
कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही