क्या यही सभ्यता है?- सिद्दीक़ अहमद मेव
कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही सभ्यता है? अनाथ होता बचपन माँँ-बाप का छिनता साया, चीखती हुई इनसानियत, क्या यही सभ्यता है? लहुलुहान होता बचपन, तड़पते हुए मासूम जिस्म, टूटती हुई […]