ब्रजेश कृष्ण की कविताएं

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सब जानती है पृथ्वीRelated image

पृथ्वी को सब मालूम है
सब जानती है पृथ्वी
हम में से जब कोई नहीं था
तब भी थी पृथ्वी
तभी से सभी कुछ देखती है पृथ्वी

देखो-देखो पहली बार कोई हल चला रहा है
देखो-देखो पहली बार कोई कपड़ा बुन रहा है
देखो-देखो पहली बार बन रही है नाव
देखो उठ रही है पहली रोटी की सुगन्ध
चल पड़ा है पहले कुम्हार का पहिया
देखो-देखो हँस रही है पृथ्वी

अभी-अभी रख दिया है किसी ने
राजसिंहासन पृथ्वी की छाती पर
और मुस्कराया है दर्प से
देखो-देखो निकल पड़ा है अश्वमेध का घोड़ा
और रौंद रहा है पृथ्वी
बन रहे हैं दुर्ग, प्रासाद,
नगर, प्राचीर, किले, कंगूरे,
फहरा रही हैं पताकाएं
बांटी जा रही है पृथ्वी
काटी जा रही है पृथ्वी
नहीं थमता जय-पराजय का सिलसिला
जीतता नहीं है कोई
हारता नहीं है कोई

हारती है सिर्फ पृथ्वीRelated image
कराहती है सिर्फ
देखो अब गढ़ी जा रही हैं कूटलिपियां
रचे जा रहे हैं ग्रंथ, संविधान
आकाश छू रही हैं अट्टालिकाएं
भागदौड़, बारूद, धुआं, ध्वंस
उड़ाए जा रहे हैं पहाड़
खोद कर लूटी जा रही है नदी
पृथ्वी के पेट से निकाला जा रहा है लालच
तैनात हैं भयानक हथियार
पृथ्वी के हर छोर पर
ये कैसा समय है
कि अपनी धुरी पर पृथ्वी के घूमने के पहले ही
बदल जाते हैं हम

ये कैसी डरावनी परछाइयाँ
कि छिप रहे हैं हम
अपनी ही चालाक हँसी के पीछे
तहस-नहस हो रहे हैं घोंसले
डूब रही है पक्षियों की आवाज
मर रहा है हवा का संगीत

डर रही है पृथ्वी
सिकुड़ रही है पृथ्वी

मगरRelated image
सिर्फ इतिहास नहीं है पृथ्वी
सिर्फ भूगोल नहीं है पृथ्वी
पृथ्वी के पास नहीं है समय पश्चाताप का
अपनी कक्षा में अनवरत घूमते हुए
हर समय सम्भव है उसका पृथ्वी बने रहना

देखो-देखो
उस ओर तो देखो
जहाँ खंडहर को चीर कर
पीपल उगा रही है पृथ्वी

वत्सला है पृथ्वी
वसुंधरा है पृथ्वी

कृष्णाबाई का सवालRelated image

पाँच घरों में पूरे महीने भर तक
बर्तन माँजने के बाद
कृष्णाबाई कमाती है छै सौ रुपये
उसके बारह बरस के लड़के ने
अपने ही घर से चुराए वे रुपये
और खरीद कर ले आया
छः सौ के जूते चुपचाप

सवाल यह है कि
कृष्णाबाई अब कहाँ रोये? किससे लड़े?
उन घरों से?
बाजार से?
बेटे से?
या खुद से?

छूटी हुई जगह में बूढ़े

शब्दों और सूचनाओं
की है बहुतायत
मगर समय कम पड़ रहा है इन दिनों

ठहर कर सोचना समझा जा रहा है
समय की बरबादी
और जारी है विचार से परहेज

कीमती और शानदार जूतों की चाह में
बहुत तेजी से बीत रही है
जिन्दगी इन दिनों

समय से बाहर
छूटी हुई जगह में बैठे कुछ बूढ़े
बहुत कुछ कहना चाहते थे इन दिनों
मगर एक युवा लड़का
फ्लैश लाइट चमकाकर
गुजरा कुछ इस तरह
कि शब्दों की बहुतायत के बावजूद
वे अबोले रह गए इन दिनों

अब तक बचे रहने की खुशी मेंRelated image

दिन भर के काम के बाद
घुसता है वह घर में
ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ
कि लौट सका है वह
बगैर किसी हादसे के
उसके जीवन में बची है बस
हादसे से बचे रहने की खुशी

पचास से ऊपर का वह आदमी
देखता है दीवार पर टँगा नक्शा
नक्शे में बनी है समूची पृथ्वी
पृथ्वी पर बहुत कुछ
मगर नक्शे में नहीं है वह
उसका शहर या घर

पचास से ऊपर का आदमी
जानता है अच्छी तरह
कि नक्शे में नहीं होते
उस जैसे लोग, घर या शहर
मगर वह टाँगता है
अपने चेहरे को नक्शे के ऊपर

हादसे से अब तक
बचे रहने की खुशी में

 

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