


पृथ्वी को सब मालूम है
सब जानती है पृथ्वी
हम में से जब कोई नहीं था
तब भी थी पृथ्वी
तभी से सभी कुछ देखती है पृथ्वी
देखो-देखो पहली बार कोई हल चला रहा है
देखो-देखो पहली बार कोई कपड़ा बुन रहा है
देखो-देखो पहली बार बन रही है नाव
देखो उठ रही है पहली रोटी की सुगन्ध
चल पड़ा है पहले कुम्हार का पहिया
देखो-देखो हँस रही है पृथ्वी
अभी-अभी रख दिया है किसी ने
राजसिंहासन पृथ्वी की छाती पर
और मुस्कराया है दर्प से
देखो-देखो निकल पड़ा है अश्वमेध का घोड़ा
और रौंद रहा है पृथ्वी
बन रहे हैं दुर्ग, प्रासाद,
नगर, प्राचीर, किले, कंगूरे,
फहरा रही हैं पताकाएं
बांटी जा रही है पृथ्वी
काटी जा रही है पृथ्वी
नहीं थमता जय-पराजय का सिलसिला
जीतता नहीं है कोई
हारता नहीं है कोई
हारती है सिर्फ पृथ्वी
कराहती है सिर्फ
देखो अब गढ़ी जा रही हैं कूटलिपियां
रचे जा रहे हैं ग्रंथ, संविधान
आकाश छू रही हैं अट्टालिकाएं
भागदौड़, बारूद, धुआं, ध्वंस
उड़ाए जा रहे हैं पहाड़
खोद कर लूटी जा रही है नदी
पृथ्वी के पेट से निकाला जा रहा है लालच
तैनात हैं भयानक हथियार
पृथ्वी के हर छोर पर
ये कैसा समय है
कि अपनी धुरी पर पृथ्वी के घूमने के पहले ही
बदल जाते हैं हम
ये कैसी डरावनी परछाइयाँ
कि छिप रहे हैं हम
अपनी ही चालाक हँसी के पीछे
तहस-नहस हो रहे हैं घोंसले
डूब रही है पक्षियों की आवाज
मर रहा है हवा का संगीत
डर रही है पृथ्वी
सिकुड़ रही है पृथ्वी
मगर
सिर्फ इतिहास नहीं है पृथ्वी
सिर्फ भूगोल नहीं है पृथ्वी
पृथ्वी के पास नहीं है समय पश्चाताप का
अपनी कक्षा में अनवरत घूमते हुए
हर समय सम्भव है उसका पृथ्वी बने रहना
देखो-देखो
उस ओर तो देखो
जहाँ खंडहर को चीर कर
पीपल उगा रही है पृथ्वी
वत्सला है पृथ्वी
वसुंधरा है पृथ्वी

पाँच घरों में पूरे महीने भर तक
बर्तन माँजने के बाद
कृष्णाबाई कमाती है छै सौ रुपये
उसके बारह बरस के लड़के ने
अपने ही घर से चुराए वे रुपये
और खरीद कर ले आया
छः सौ के जूते चुपचाप
सवाल यह है कि
कृष्णाबाई अब कहाँ रोये? किससे लड़े?
उन घरों से?
बाजार से?
बेटे से?
या खुद से?
शब्दों और सूचनाओं
की है बहुतायत
मगर समय कम पड़ रहा है इन दिनों
ठहर कर सोचना समझा जा रहा है
समय की बरबादी
और जारी है विचार से परहेज
कीमती और शानदार जूतों की चाह में
बहुत तेजी से बीत रही है
जिन्दगी इन दिनों
समय से बाहर
छूटी हुई जगह में बैठे कुछ बूढ़े
बहुत कुछ कहना चाहते थे इन दिनों
मगर एक युवा लड़का
फ्लैश लाइट चमकाकर
गुजरा कुछ इस तरह
कि शब्दों की बहुतायत के बावजूद
वे अबोले रह गए इन दिनों

दिन भर के काम के बाद
घुसता है वह घर में
ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ
कि लौट सका है वह
बगैर किसी हादसे के
उसके जीवन में बची है बस
हादसे से बचे रहने की खुशी
पचास से ऊपर का वह आदमी
देखता है दीवार पर टँगा नक्शा
नक्शे में बनी है समूची पृथ्वी
पृथ्वी पर बहुत कुछ
मगर नक्शे में नहीं है वह
उसका शहर या घर
पचास से ऊपर का आदमी
जानता है अच्छी तरह
कि नक्शे में नहीं होते
उस जैसे लोग, घर या शहर
मगर वह टाँगता है
अपने चेहरे को नक्शे के ऊपर
हादसे से अब तक
बचे रहने की खुशी में