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सबुकछ जानती है पृथ्वी... ये कैसी डरावनी परछाइयाँ कि छिप रहे हैं हम अपनी ही चालाक हँसी के पीछे तहस-नहस हो रहे हैं घोंसले डूब रही है पक्षियों की आवाज मर रहा है हवा का संगीत

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