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कविताJuly 9, 2018

कविता ये लाशें जो जमीन पर अस्त व्यस्त पडी हैं कुछ क्षण पहले ये हंस खेल रहे थे मारने से पहले इन्हें, घर से बुलाया गया था ये मां जो

कविताJune 28, 2018

साखी – सात दीप नौ खण्ड में, सतगुरु फेंकी डोर। हंसा डोरी न चढ़े, तो क्या सतगुुरु का जोर।। टेक तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे। चरण – मैं

विविधJune 24, 2018

यदि तोर डाक सुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे। यदि केउ कथा न कय, ओरे ओ अभागा यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले ओरे तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा, एकला बोलो रे !ऑ यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओ अभागा! […]

कविताJune 21, 2018

बाल कविता मैं हूं गैस गुबारा भैया ऊंची मेरी उड़ान नदियां-नाले-पर्वत घूमूं फिर भी नहीं थकान बस्ती-जंगल बाग-बगीचे या हो खेत-खलिहान रुकता नहीं कहीं भी पलभर देखूं सकल जहान उड़ते-उड़ते

उत्सव हरियाणा सृजन सिद्दीक अहमद मेव एक साथ इतने हैं रंग, देख के मैं तो रह गया दंग,, कोई गा रहा दफ पर यहां, कोई बजा रहा है मृदंग, उत्सव

सबुकछ जानती है पृथ्वी... ये कैसी डरावनी परछाइयाँ कि छिप रहे हैं हम अपनी ही चालाक हँसी के पीछे तहस-नहस हो रहे हैं घोंसले डूब रही है पक्षियों की आवाज मर रहा है हवा का संगीत

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