रास्सा – अनुराधा बेनीवाल

कविता

कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये
तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये
घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी
माँ-बाबू तेरा हेज चहिये।
दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले
कॉलेज यूनिवर्सिटी में पढ़े का
सारा हिसाब जोड़ ले।

एक-एक किस्त मैं आप पुगा दूंगी,
तू बोझ मन्ने एकबे कहणा छोड़ दे।

मेरे पैदा होए पे आह ना भरिये,
थाली स्टील की दोनुआं में एकसी बाजेगी।
फेर देखिये तू उड़ान मेरी
दुनिया सारी आकाश में ताकेगी।

पोचा नहीं मैंने एटलस पकड़ाइये
देश-दुनिया की बात बताइये।
बोलणा मेरे तांई इसा सिखाइये,
सही बात कहण में कदे ना घबराइये।

ब्याह करुँगी अपणी मर्जी तै
बाबू मेरे गेल हांगा ना करिये।
बात बणावें सौ पड़ोसी
बाबू तू मेरे गेल खड़ा रहिये।

अपणी इज्जत, अपणे कर्म तै
लत्यां म्हं हैं सूत के तागे।
ताग्यां ने गिणन आळे
बांदर की जात तै पाछे।
हांडू-फिरूंगी अपणी मर्जी तै
रोड जितनी कूंगरां की उतनी मेरी।

मेरे तांई रोकण की बजाए
दिये उन्नें शिक्षा थोड़ी।

इब डर कै घरां नहीं बैठूंगी,
इब तो माँ, दादी, बुआ, मौसी
के नाम की भी दुनिया मैं ए देखूंगी।
भतेरा हो लिया जी ने रासा
खत्म करो यो पितृसत्ता का तमासा।


स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा( मई-जून 2016) पेज-  52

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