मास्टर सतबीरः हरियाणवी संस्कृति का अनमोल रत्न

स्मृति शेष

master satbir jiमास्टर सतबीर द्वारा गाए सांग व किस्से

भगत सिंह,  सुभाष चन्द्र बोस, उधम सिंह, अंजना पवन, नल दमयन्ती, वीजा सोरठ, चापसिंह, जयमल फत्ता, पिंगला भरथरी, जानी चोर, शाही लकड़हारा, रूप बसन्त, सरवर नीर, कृष्ण सुदामा, कृष्ण जन्म, उतानपाद, भगत पूरणमल, हूर मेनका, चन्द्रहास, मोरध्वज, हीर रांझा, गोपीचन्द, चीर पर्व, विराट पर्व, सत्यवान सावित्री, लीलो चमन, पदमावत, चन्दकिरण, हीरामल जमाल, सेठ ताराचन्द, वीर विक्रमाजीत, नौरत्न, बणदेवी, वीर हकीकतराय, शिवजी का विवाह, हरनन्दी का भात, श्रवण कुमार, सती बपोला, गौतम बुद्ध, भूप पूरंजन, वीर सावरकर, जल करण, मीरा बाई, उषा अनिरूद्ध, रूक्मणी का विवाह, अजीत सिंह राजबाला, शकुन्तला दुष्यन्त, राजा हरिशचन्द्र, फूल सिंह नोटंकी, लख्मी का ब्रह्मज्ञान, मांगेराम का ब्रह्मज्ञान, जगदीश का ब्रह्मज्ञान, हरफूल जाट जुलानी, उपदेशक भजन

सोनीपत जिले के गांव भैंसवाल कलां में जन्में मास्टर सतबीर हरियाणवी  संस्कृति के ऐसे कलाकार हुए हैं जिन्होंने अपनी गायन शैली के माध्यम से विभिन्न लेखको की रागनी व भजनो को घर घर तक पहुँचाया है। मास्टर सतबीर सिंह को  हजारों भजन व रागनियां याद थी । वे बहुत ही सुरीले व लयबद्ध गाने वाले कलाकार थे। उहनकी अदाकारी को देखने के लिए लोग बड़े चाव से इकटठा होते थे। मास्टर जी बहुत ही सीधे व सरल स्वभाव के इन्सान थे। वे बडे प्रेम से लोगो से पेश आते थे और बहुत ही मिलनसार थे। इन्हीं गुणों के कारण हर कोई उनसे प्यार करता था। इनके गाने के स्तर के इतना ऊँचा होने के फलस्वरूप हरियाणा सरकार ने उन्हें हरियाणा गोरव सम्मान से अलंकृत किया था।

मास्टर सतबीर का अधिकतर जीवन गाने व पढाने में ही व्यतीत हुआ। वे पी टी आई के पद पर थे और अध्यापन के दौरान उन्होंने भिन्न-भिन्न गांवों को अपनी सेवा दी। उनकी पहली तैनाती जौली गांव में हुई थी। वो रिवाड़ा और रभड़ा के सरकारी स्कूलों में भी तैनात रहे । 2009 में वो सेवानिवृत हुए। वे बहुत अच्छे खेल परीक्षक थे और उन्होंने योगेश्वर दत्त जैसे हीरे को तराशने का कार्य किया, जिस पर देश को नाज है।

मास्टर सतबीर ने बहुत से किस्से व भजन गाए हैं। वे किस्से व सांग में यथास्थान अपनी रागनी भी शामिल कर लिया करते थे । मास्टर सतबीर ने अपनी गायन शैली के माध्यम से हरियाणवी  संस्कृति को 45 से 50 वर्षों के करीब इसे निरन्तर चलायमान रखा। वे निरन्तर अभ्यासरत रहते थे, जिससे उनकी याददाश्त बहुत बढिय़ा थी। उन्हें कभी भूलते हुए नहीं देखा। उन्होंने बहुत से सांग व किस्सों की रीकार्डिंग की ताकि वो भविष्य में हमें अपनी संस्कृति को सहेज कर रखने में हमारी सहायता कर सकें।

मास्टर सतबीर जी मधुमेह से पीडि़त थे। किडनी खराब होने से रोहतक से नियमित डायलिसिस करवा रहे थे। सोमवार सुबह तेज बुखार के चलते उन्हेें गोहाना लाया गया जहां हस्पताल में उन्हे मृत घोषित कर दिया गया। 18 जुलाई 2016 सुबह के समय  हरियाणवी संस्कृति के इस इस अनमोल रत्न ने इस धरा पर अपनी अन्तिम सांस ली।

उनके परिवार में उनकी पत्नी कृष्णा देवीए बेटा संदीप, बेटियां ममता व राखी हैं। उनका पुत्र संदीप उनकी इस कला को निरन्तर आगे बढ़ा रहा है।

मा. नरेन्द्र कुमार, गांव कोथ कलाँ  (हिसार)

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर- अक्तूबर 2016), पेज- 57

 

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