साखी – कहंता1 तो बहुत मिला, गहंता2 मिला न कोय। सो कहंता बहि जान दे, जो न गहंता होय।।टेक अमल करे सो पाई रे साधो भाई अमल करे सो पाई।
साखी – कहंता1 तो बहुत मिला, गहंता2 मिला न कोय। सो कहंता बहि जान दे, जो न गहंता होय।।टेक अमल करे सो पाई रे साधो भाई अमल करे सो पाई।
साखी – पूरब दिशा हरी को बासा, पश्चिम अल्लह मुकामा। दिल में खोजि दिलहि मा खोजे, इहै करीमा रामा।।टेक – म्हारो हीरो हेराणो कचरा में, पांच पचीस का झगड़न में।
साखी – हंसो का एक देश है, जात नहीं वहां कोय। कागा करतब ना तज1 सके, तो हंस कहां से होय।।टेक नाम से मिल्या न कोई रे साधो भाई नाम
साखी – बैस्नों भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक। छापा तिलक बनाई करि, दुविधा लोक अनेक।। टेक – पंडित छाण पियो जल पाणी, तेरी काया कहां बिटलाणी1। चरण –
साखी – कस्तूरी कुण्डली बसे, मृग ढूंढे वन माहि। जैसे राम घट-घट बसे, दुनिया जाने नाही।। जा बसे निरंजन राय, बैकुण्ठ कहां मेरे भाई। चरण – कितना ऊंचा कितना नीचा
साखी – मन मंदिर दिल द्वारखा, काया काशी जान। दस द्वारे का पिंजरा, याहि2 में ज्योत पहचान।। टेक तन काया का मंदिर साधु भाई, काया राम का मंदिर। इना मंदिर
साखी – हिन्दू के दया नहीं, मेहर1 तुरक के नाहीं। कहे कबीर दोनों गए, लख2 चौरासी माही।टेक मुल्ला कहो किताब की बातें। चरण – जिस बकरी का दूध पिया, हो
साखी – पाथर पूजत हरि मिले, तो मैं पूजु पहाड़। वा से तो चाकी भली, पीस खाये संसार।।टेक धातु की धेनु दूध नही देती रे बीरा म्हारा, धातु की धेनु
साखी – सेख सबूरी बाहिरा, क्या हज काबै जाई। जाकि दिल साबित2 , वाकौ3 कहां खुदाय। टेक बेराग कठे है मेरा भाई, सब जग बंधिया4 भरम के माही। चरण –
साखी – दुविधा2 जाके मन बसे, दयावन्त जीव नाही। कबीर त्यागो ताहि को, भूलि देखो जिन्ह नाहीं।।टेक – पंडित वाद वदे सो झूठा राम कहे जगत गति होवे तो खांड3
साखी – मन मतंग माने नहीं, जब लग गथा3 न खाय। जैसे विधवा इस्त्राी, गरभ रहे पछताय।।टेक मन तुम नाहक दूंद मचाये। चरण – करि असनान, छूवो नहिं काहू, पाती
घट-घट में रामजी बोले साखी -एक समाना सकल में, सकल समाना ताहि1। कबीर समाना मुझ2 में, वहां दूसरा नाहि।।टेक घट-घट में रामजी बोले री, परगट3 पीयाजी बोले री, मंदिर में
साखी – सिद्ध भया तो क्या भया, चहु दिस1 फूटी बास2। अंदर वाके बीज है, फिर उगन की आस3। टेक जोगी मन नी रंगाया, रंगाया कपड़ा। पाणी में न्हाई-न्हाई पूजा फतरा4,
संगत साधु की, नित2 प्रीत कजे जाय। दुर्मति दूर बहावसि3, देखी सूरत जगाय।।टेक – कोई सफा न देखा दिल काचरण – बिल्ली देखी बगला देखा, सर्प जो देखा बिल का।
साखी – हिरदा भीतर आरती2, मुख देखा नहीं जाय। मुख तो तबहि देखहि, जो दिल की दुविधा जाय।।टेक भाई रे दुइ जगदीश कहां ते आया, कहुं कौनें भरमाया। चरण –
साखी -ऐसी मति संसार की, ज्यों गाडर1 का ठाठ2। एक पड़ा जेहि गाड़3 में, सबै जाहि तेहि बाट।।टेक -क्यों भूलीगी थारो देस दीवानी क्यों भूलीगी थारो देस हो-चरण -भूली मालन4
साखी – सात दीप नौ खण्ड में, सतगुरु फेंकी डोर। हंसा डोरी न चढ़े, तो क्या सतगुुरु का जोर।। टेक तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे। चरण – मैं
साखी – माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर। कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर।।टेक – अवधू, भजन भेद है न्यारा।। चरण – क्या गाये
साखी – दौड़त-दौड़त दौड़िया, जहां तक मन की दौड़ दौड़ थका मन थिर2 हुआ, तो वस्तु ठौर की ठौर।।टेक – मौको कहां ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास। चरण
साखी – एकै त्वचा हाड़ मूल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा। एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शुद्रा।।टेक साधौ, पांडे निपुन कसाई। चरण – बकरी मारि भेड़ी
संवाद विश्वविख्यात भाषा वैज्ञानिक, दार्शनिक, वामपंथी लेखक नोम चोम्स्की ने भाषाविज्ञान संबंधी कई क्रांतिकारी सिद्धांतों का सूत्रपात किया। भाषा और भाषा के विकास को लेकर उनका यह साक्षात्कार विज्ञान पत्रिका
खेती-बाड़ी वर्तमान में प्रचलित रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक आधारित खेती संकट में है इसके बारे में शायद ही कोई मतभेद है। सरकारी और कृषि संस्थानों के दस्तावेज भी इस संक
आलेख भारत के राजनीतिक गठन में सैद्धांतिक स्तर पर भाषा को मुख्य आधार माना गया है, परन्तु वास्तविक रूप में ऐसा हो नहीं रहा। भाषा का शिक्षा व प्रशासन आदि
कविता जब मेरे दोस्त मुझे कबीर बना रहे थे मैं प्यादों की ताकत से ऊंटों की शह मात बचा रहा था घोड़े दौड़ा रहा था तभी मेरे भीतर