कविता सभ्यता के गुमान में सदियों पहले जब आदिमानव बिना कपड़ों के जीता था तब भी उसे एक मादा ने पैदा किया था। अपने शरीर में धारण किया था उसका
कविता सभ्यता के गुमान में सदियों पहले जब आदिमानव बिना कपड़ों के जीता था तब भी उसे एक मादा ने पैदा किया था। अपने शरीर में धारण किया था उसका
कविता आइये देखें आइये देखें रोज़-रोज़ गिरावट की नित-नयी किस्में.. नाचती हुई नायिका के थिरकते हुए नितम्ब.. और नायक का निगेटिव शेड, हंसोकड़ी.. अवसर की चौपड़ सजाते लोग.. पसरते हुए
कविता विदाई समारोह एक विदाई समारोह देखा। निबटारा देखा। रिश्तों का पिछवाड़ा देखा। कुछ आंसू थे, बेखुशबू के फूल बिछे थे- पर जाते-जाते जाने वाले ने मुड़कर दोबारा देखा। कुछ
कविता सच के हक़ में तुम जानते हो कि तुम दिमाग़ को मार नहीं सकते। तुम जानते हो कि एक दिन तुम्हारी बेशर्मी भी तुम्हारे किसी काम ना आयेगी। तुम
कविता वर्जीनिया को पढ़ते हुए एक अदद कमरे की ज़रूरत है एक प्याली कॉफ़ी जहां हो एक प्याली कॉफ़ी और कुछ किताबें कुछ देर का बेबाक लेटना कुछ अन्दरूनी कपड़े
कविता आती रहेंगीं बेटियां जीवन निरंतर चलता रहे ये उसूल कुदरत ने बनाया था और हमने वो उसूल तोड़ दिया। फिर कुछ यूं हुआ की हमने कुदरत को सुनना छोड़
कविता बाप लिखवादे मियरो नाम, स्कूल में पढण कू जाउंगों। मैं करूगों कड़ी मिहनत बाप , स्कूल में फस्र्ट आउंगों।। बेकदइन बकरीन ने, मैं चराणकू नही जाउगों। दिवादे कापी किताब
कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस
किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़
पंछी भर इक नई परवाज़ भर इक नई परवाज़ पंछी! भर इक नई परवाज़ जितने छोटे पंख हैं तेरे उतने लम्बे राह हैं तेरे तेरी राहों में आखेटक ने किया
कविताएं पिसती है सिर्फ जनता नेता लोगों को बहलाता है नए-नए ख्वाब दिखाता है कुर्सी पर बैठते ही हम सबको आंख दिखाता है पत्रकार झूठी-सुच्ची खबरें लाता है जनता की
कविता चौपाये अतीत प्रतिबद्ध हैं वे कटिबद्ध हैं वे वर्तमान व भविष्य को स्वर्णिम अतीत की ओर धकेलने को चलो धकेलो-पेलो धकेलते चलो पेलते चलो राज पथ पर जन-जन को
कविता वे बरसने वाले हैं पंजाब से खबर आई है सुरजीत ने अपना ट्रेक्टर औने-पौने दामों में बेच दिया है खेती के छोटे-मोटे औजार कबाड़ी की रद्दी झोली में डाल
अच्छी लड़कियां खिड़की से झांकती लड़कियां देखती है हंसती खिलखिलाती लड़कियों को चीखती चिल्लाती लड़कियों को भीड़ के आगे चलती आंदोलन करती लड़कियों को जोर जोर आवाज़ देकर उन्हें बुलाती
हमें लिखो स्याह न हो आने वाले दिन कवि ! इन दिनों के बारे में जरूर लिखो सबको मिले न्याय और सब हो अलहादकारी भेदभाव मिटे, कवि कुछ ऐसा लिखो
अन्त मंथन ये आबो हवा बेचैन सी लगती है मुझे आज रूह हर शख्स की इस शहर में बेदम सी लगती है मुझे आज लगता है खो गया है। उसका
उत्सव हरियाणा सृजन सिद्दीक अहमद मेव एक साथ इतने हैं रंग, देख के मैं तो रह गया दंग,, कोई गा रहा दफ पर यहां, कोई बजा रहा है मृदंग, उत्सव
सबुकछ जानती है पृथ्वी... ये कैसी डरावनी परछाइयाँ कि छिप रहे हैं हम अपनी ही चालाक हँसी के पीछे तहस-नहस हो रहे हैं घोंसले डूब रही है पक्षियों की आवाज मर रहा है हवा का संगीत
खबर मिली मुझे, और मैं उत्सव में चला आया। सैनी जी ने कॉल कर, उत्सव से अवगत कराया।। सृजन से कराया अवगत, मैंने राह मेवात से पकरी। गुरु सिद्दीक मेव संग, जा पंहुचा धर्मनगरी।।
सिर पर ईंटें पीठ पर नवजात शिशु शिखर दुपहरी दो जून रोटी के लिए पसीने से तर-बतर यह मजदूरनी नहीं जानती कि किसे वोट करना है मालिक जहां बटन दबाएगा वोट हो जाएगा हमारे लोकतंत्र का यही है कड़वा सच स्रोत ः देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज- 55
ये कविताएं उन हाथों के लिए जो जंजीरों में जकड़े हैं लेकिन प्रतिरोध में उठते हैं उन पैरों के लिए जो महाजन के पास गिरवी हैं लेकिन जुलूस में शामिल
बागी लड़कियां मैं जानती हूं बहुत सारी बागी लड़कियों की पहचान यहां तक कि उनके नाम व पते भी परन्तु आपको नहीं बताउंगी, वरना हो सकता है आप उन्हें ढूंढ निकाले अपने घर के उस अन्दर वाले कमरे में जिसकी कोई खिड़की बाहर नहीं खुलती।