अधबने फूल की हिमायत में – कुलदीप कुणाल

 कविता

अधबने फूल की हिमायत में

उस स्कूल में बहुत से चित्र थे
एक बच्चा चिंतित था क्यूंकि होमवर्क पूरा नहीं था
एक बच्चे को ज़ोर की भूख लगी थी और वो छुट्टी के इंतज़ार में था
एक बच्चा मां से खफ़़ा था
एक बच्चे का आज ही जन्मदिन था
एक बच्ची अपने बालों में उलझी थी
एक बच्ची की दादी को आज ही घर आना था
एक बच्चा अपने सहपाठी को चिढ़ा रहा था
एक बच्चा टीचर से छुप अपनी कॉपी में फूल बना रहा था
अचानक धमाके हुए.. गोलियां चलीं… ख़ून ही ख़ून था…
बचपन मर गया था। बेशर्मी, बेरहमी जि़ंदा थी।
वो किसी देश के, किसी ज़ात के बच्चे नहीं थे..
इस धरती के बच्चे थे वो, जो मार दिये गये
वो इस दुनिया के बच्चे थे…
जो दहशतग़र्दी, दंगों, बलात्कारों और नफऱत से बनती इस दुनिया में-
कुछ मासूमियत और बेफि़क्री पैदा करते।
वे युद्धों के बाज़ार में शायद ऐसा बम बनाते जिसके फटते ही
पूरी दुनिया गलबहियां डाल मुहब्बत-ओ-ख़ुशी से झूमती..
जब हमला हुआ तो बेफि़क्र बच्चे उधेड़-बुन में थे।
नीली स्याही से कुछ लिख रहा था कोई नन्हा हाथ।
वो क्या लिख रहा था?
कौन सी भाषा ?
कौन सी कहानी….कविता?
वो बच्चा जो छुप कर अपनी कॉपी में फूल बना रहा था-
वो फूल अधबना ही रह गया…

(16 दिसम्बर2015, को पेशावर के एक स्कूल में हुए दहशतगर्द हमले के खि़लाफ़।)

स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 20

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Leave a Reply

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

Discover more from desharyana.in

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading