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कविताJune 26, 2018

कविता मैं खौफनाक चाबुकधारी नहीं कांप जाओगे जिससे। मैं पुष्प अणु हूं तुम्हारी सांसों तुम्हारे लहु में समा जाऊंगा मस्तिष्क पर बैठ करके सम्मोहित कर दूंगा मदहोश। और फिर मेरी

किसको वतन कहूंगा? हर जगह लहूलुहान है धरती हर जगह कब्रों -सी चुप पसरी अमन कहा मैं दफऩ करूँगा मैं अब किसको वतन कहूँगा तोड़ डाली नानक की भुजाएं पकड़

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