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कविता नमस्ते भतेरा ढो लिया तेरी कल्चर का बोझ, इब चलाइए ट्रैक्टर रोज। आधी धरती आधा घर, पूरी पढ़ाई, बणु अफसर। देखणी मैंने दुनिया सारी, छोड़ दी या सरम की

कविता कंठी ना चाहंदी, खेत चहिये तीळ ना चाहंदी, रेत चहिये घर भी मैं आपे बणा ल्यूंगी माँ-बाबू तेरा हेज चहिये। दूस्सर नहीं, मेरी किताब जोड़ ले कॉलेज यूनिवर्सिटी में

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