मास्टर सतबीरः हरियाणवी संस्कृति का अनमोल रत्न

स्मृति शेष मास्टर सतबीर द्वारा गाए सांग व किस्से भगत सिंह,  सुभाष चन्द्र बोस, उधम सिंह, अंजना पवन, नल दमयन्ती, वीजा सोरठ, चापसिंह, जयमल फत्ता, पिंगला भरथरी, जानी चोर, शाही लकड़हारा, रूप बसन्त, सरवर नीर, कृष्ण सुदामा, कृष्ण जन्म, उतानपाद, भगत पूरणमल, हूर मेनका, चन्द्रहास, मोरध्वज, हीर रांझा, गोपीचन्द, चीर पर्व, विराट पर्व, सत्यवान सावित्री, लीलो चमन, पदमावत, चन्दकिरण, हीरामल जमाल, सेठ ताराचन्द, वीर विक्रमाजीत, नौरत्न, बणदेवी, वीर […]

अंजू – कृषि और महिलाएं

आलेख हमारा प्रदेश कृषि प्रधान है। प्रदेश की जनसंख्या का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा कृषि के कार्य में संलग्न है। यहां के निवासियों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि होने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। कृषि के कार्य में औरत और पुरुष की दोनोंं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।  कृषि के […]

नारनौल के सतनामी

इतिहास ◊ प्रो सूरजभान सतनामी सम्प्रदाय में जाट, चमार, खाती आदि छोटी जातियों के लोग शामिल थे। परन्तु उन्होंने अपने जातिगत भेद मिटा दिए थे। वे सादा भोजन करते और फकीरों जैसा बाना पहनते थे। सतनामी हर प्रकार के उत्पीड़न के खिलाफ थे। इसलिए अपने साथ हथियार लेकर चलते थे। दौलतमंदों की गुलामी करना उन्हें […]

योगेन्द्र यादव से सुरेन्द्र पाल सिंह की बातचीत – खारिज करना पड़ेगा कृषि विरोधी विकास के मॉडल को

सुरेन्द्र पाल सिंह – आज देश में कृषि के संकट की चर्चा हो रही है। आप इसे कैसे परिभाषित करते हैं? इस संकट के क्या कारक हैं? योगेन्द्र यादव – जब हम कहते हैं कि भारतीय कृषि संकट में है, तो इसका मतलब है कि खेती-किसानी की समस्या केवल समय या स्थान विशेष से जुड़ी […]

सुनील दत्त – हिन्दी सिनेमा में किसान-जीवन

सिनेमा माध्यम भारत में अपने सौ साल पूरे कर चुका है। सिनेमा ने भारतीय समाज को गहरे से प्रभावित किया है। बदलते हुए समाज को भी सिनेमा में देखा जा सकता है। भारत की अधिकांश आबादी खेती-किसानी से जुड़ी है।  पिछले कुछ समय से खेती-किसानी पर गहरा संकट है, लेकिन सिनेमा जगत में किसानी के […]

कौआ और चिड़िया

लोक कथा                 एक चिड़िया थी अर एक था कौआ। वै दोनों प्यार प्रेम तै रह्या करै थे। एक दिन कौआ चिड़िया तै कहण लाग्या अक् चिड़िया हम दोनों दाणे-दाणे खात्तर जंगलां म्हं फिरैं, जै हम दोनों सीर मैं खेती कर ल्यां तो आच्छा रैगा। चिड़िया भी इस बात पै राजी होग्यी। आगले दिन चिड़िया […]

विनोद कुमार – डॉ. आम्बेडकर किसान नेता के रूप में

आलेख अर्थशास्त्री, राजनेता, मंत्री लेखक, संविधान निर्माता  आदि सभी रूपों और परिस्थितियों में डा.आम्बेडकर ने किसान हित की अनदेखी नहीं की। वे समय-समय पर सभी रूपों में किसानों के कल्याण हेतु वे समर्पित रहे।  हर वो व्यक्ति जिसमें जरा सी भी बौद्धिक ईमानदारी है डॉ. आम्बेडकर को किसान हितैषी नेता के रूप में मानेगा।  कृषि […]

सुमित सौरभ  – महिला की पूर्व निर्धारित भूमिका में बदलाव

सामाजिक न्याय अपने निर्माण के पचास वर्षों के दौरान हरियाणा राज्य का तीव्र आर्थिक विकास हुआ है। विकास के माप हेतु निर्मित सूचकांक के विभिन्न सूचकों को इस राज्य के संदर्भ में देख कर हम खुश हो सकते हैं, लेकिन ठीक इसी समय राज्य के लैंगिक विकास सूचकांक, लैंगिक समानता सूचकांक के विभिन्न सूचकों को […]

जगमति सांगवान – महिलाओं के प्रति सामाजिक नजरिया

महिला जब हम छोटे थे तो हमारी दादी-मांओं, चाची-ताइयों से सुना करते थे कि जब आजादी का आंदोलन जारी था तो वो ये गीत बड़े ही चाव से गाया करती थी ‘गाल्यो हे बजा ल्यो छोरियो हे, आजादी आवैगी, हे कासण धोवण-मांजण की मशीन आवैगी’ महिलाओं के जिस तलछट हिस्से की आजादी से आकांक्षाओंं को […]

नरेश कुमार – हरियाणा में प्रवासी मजदूर

सामाजिक न्याय हरियाणा इस वर्ष अपनी स्वर्ण जयंती मना रहा है। ये 50 साल हर क्षेत्र में हुए बदलावों के गवाह हैं। हरित क्रांति के प्रभावों से कृषि पैदावार में गुणात्मक बढ़ोतरी हुई थी और  कृषक आबादी को बदहाली से उबरने मे कुछ राहत मिली थी। नब्बे के दशक तक प्रदेश की किसान-आबादी कृषि कार्यों […]

डा. पंकज गुप्ता – संभ्रात वर्ग की पहुंच से भी बाहर स्वास्थ्य सेवाएं तथा उनकी कीमत

सेहत भारत में  1980-90 के दशकों तक ‘हस्पताल’ सुविधा ज्यादातर सरकारी या पब्लिक क्षेत्र में थी। आर्थिक उदारीकरण के बाद ढांचागत परिवर्तन से सरकारों ने निजी संस्थाओं के लिए सस्ती जमीन, टैक्स छूट, आयात पर छूट इत्यादि की घोषणा की, जिससे बड़े निजी अस्पतालों की स्थापना की शुरुआत हुई। आज हालात यह हैं कि सरकारों […]

हौसलों से उड़ान होती है – राजेश कुमार

मेरे पांव लडख़ड़ाते हैं लेकिन मेरे हौसलों को कभी लडख़ड़ाने नहीं दिया क्योंकि मुझे बहुत आगे तक जाना है इन्हीं पांवों से चलकर और बस आगे बढ़ते जाना है।’                      सुनील कुमार कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से पीएचडी कर रहे सुनील कुमार का जन्म जींद जिले […]

सुरेन्द्रपाल सिंह – पीर बुद्धू शाह

इतिहास हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में यमुना नदी के किनारे एक शहर की स्थापना दसवें पातशाह साहिब श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा हुई थी। इस शहर को पांवटा साहिब के नाम से जाना जाता है, जिसका कारण गुरु जी के पांव/चरणों का उस स्थान पर पडऩा था। गुरुद्वारा पांवटा साहब के नाम से […]

लड़की जो कर सकती है अमा अता आयडू, अनु.- विपुला

अफ्रीकी कहानी उनका कहना है कि मेरा जन्म घाना के मध्यभाग में स्थित एक बड़े गांव हसोडजी में हुआ। वे ऐसा भी कहते हैं कि जब सारा अफ्रीका सूखा-ग्रस्त था, तो हमारा गांव उपजाऊ माने जाने वाले राज्य की उपजाऊ तलहटी में बसा था। इसलिए मैं जब खाने में से कुछ जूठन छोड़ देती थी […]

सदानंद साही मातृभाषाओं को बचाने की जरूरत

आलेख सदानंद साही समय आ गया है कि हम भाषा के सवाल को गंभीरता से लें। भाषा मनुष्य होने की शर्त है। इसे सिर्फ अभिव्यक्ति, संपन्न और दरिद्र जैसे पैमाने लागू करना भी ठीक नहीं है। इन्हीं मान्यताओं के चलते हम अपनी भाषिक सम्पदा को गंवाते चले आ रहे हें। हमारे औपनिवेशिक प्रभुओं ने बताया […]

अवधू भजन भेद है न्यारा

साखी – माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर। कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर।।टेक – अवधू, भजन भेद है न्यारा।। चरण – क्या गाये क्या लिखी बतलाये, क्या भर्मे1 संसारा। क्या संध्या-तर्पण के कीन्हें, जो नहि तत्व विचारा।। मूंड मुंडाये सिर जटा रखाये, क्या तन लाये छारा2। क्या पूजा […]

कबीर – मौको कहां ढूंढे रे बन्दे

साखी – दौड़त-दौड़त दौड़िया, जहां तक मन की दौड़ दौड़ थका मन थिर2 हुआ, तो वस्तु ठौर की ठौर।।टेक – मौको कहां ढूंढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास। चरण – ना मैं देवल3 न मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में। ना तो कौनों क्रिया-करम में, नहीं जोग-बैराग में।। ना मैं छगरी4 ना मैं भेड़ी, […]

रसायनमुक्त वैकल्पिक कृषि क्रांतिकारी कृषि – राजेन्द्र चौधरी

खेती-बाड़ी वर्तमान में प्रचलित रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक आधारित खेती संकट में है इसके बारे में शायद ही कोई मतभेद है। सरकारी और कृषि संस्थानों के दस्तावेज भी इस संक ट की चर्चा से भरे पड़े हैं। बहस का असल मुद्दा यह है कि क्या इस रसायन आधारित खेती का कोई विकल्प है, और अगर […]

जोहड़ जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाना होगा – सत्यवीर नाहड़िया

पर्यावरण देहात की मनोरम छटा में चार चांद लगाने वाले जोहड़ों का अस्तित्व खतरे में है। कभी लोकजीवन की अगाध श्रद्धा व आस्था के केंद्र रहे जोहड़ आज प्रदूषण के गढ़ बन चुके हैं। सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सुविख्यात रहे ये प्राकृतिक जल स्रोत आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने पर विवश हैं। जोहड़ […]

अफवाहों का समाजशास्त्र – सुरेन्द्रपाल सिंह

फवाह की मारक शक्ति समाज को छिन्न-भिन्न कर सकती है, खून की नदियां बहा सकती है, तबाही का मन्जर और ना भरने वाले जख्मों को पैदा कर सकती है।हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन  से पनपी सामाजिक दरार को पाटने के उद्देश्य से गठित किये गए सद्भावना मंच के राज्य सयोंजक के नाते मार्च और अप्रैल 2016 के राज्य भर में घूमते हुए अफवाह के खतरनाक चरित्र के व्यवहारिक पक्ष को समझने का मौका मिला। समझ में आया कि एक सामान्य घटना को अफवाह के माध्यम से अतिरंजित रूप में फैलाया जा सकता है और और जिसके  भयंकर परिणाम निकल सकते हैं।

गुम हो रहा देश का भविष्य – रामफल दयोरा

अक्सर सार्वजनिक स्थानों, बस स्टैंड व रेलवे स्टेशनों पर भीख मांगते, होटल-ढाबों व कहीं बंधुवा मजदूर के रूप में काम करते हुए ‘छोटू’ देखते हैंं। हमारी जिज्ञासु प्रवृत्ति कभी यह जानने के लिए प्रेरित नहीं हुई कि आखिर ये ‘छोटू’ बने बच्चे हैं कौन? कहां से पैदा होते हैं? कभी दो कदम आगे बढ़कर उनसे दो बातचीत करने की कोशिश नहीं की।  इनके प्रति एक ही धारणा बनी हुई है कि इनके माता-पिता पैसों के लालच में जान-बूझकर ये सब करवाते हैं। लेकिन सभी का केवल यह सच नहीं होता है।

चार्ली चैपलिन की फिल्म द डिक्टेटर का आखिरी भाषण

चीजों का वायदा करके इन धोखेबाजों ने सत्ता हथिया ली। लेकिन वे झूठे हैं, वे अपना वायदा पूरा नहीं करते, वे कभी नहीं करेंगे। तानाशाह खुद को आजाद कर लेते हैं, लेकिन जनता को गुलाम बना देते हैं। हम दुनिया को आजाद करने की लड़ाई लड़ें…राष्ट्रीय बाड़ों को हटा देने की लड़ाई, लोभ, नफरत व असहिष्णुता को उखाड़ फैंकने की लड़ाई! एक ऐसी दुनिया के लिए लड़ें, जहां विज्ञान और उन्नति हम सबके लिए खुशियां लेकर आए। सैनिकों, लोकतंत्र के नाम पर हम सब एक हो जाएं।

एकला चलो, एकला चलो रे – गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर

यदि तोर डाक सुने केउ न आसे तबे एकला चलो रे, एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे। यदि केउ कथा न कय, ओरे ओ अभागा यदि सबाई थाके मुख फिराये, सबाई करे भय तबे परान खुले ओरे तुई मुख फुटे तोर मनेर कथा, एकला बोलो रे !ऑ यदि सबाई फिरे जाय, ओरे ओ अभागा! […]

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?