आबिद आलमी यादगार मुशायरा – अविनाश सैनी

सांस्कृतिक हलचल

‘आबिद आलमी’ (‘आबिद’ यानी तपस्वी, और ‘आलमी’ यानी इस दुनिया का), अपना यह तख़ल्लुस यानी कवि-नाम रखा था अपने वक़्त के जाने-माने शिक्षक और हरियाणा में शिक्षक-आंदोलनों के पहली पंक्ति के सिपाही जनाब राम नाथ चसवाल ने। इसी नाम से वे शायरी किया करते थे और इसी शायर की याद में सातवाँ’आबिद आलमी यादगार मुशायरा’ 19 जून 2016 को रोहतक में हुआ। मुशायरे में चर्चित शायर गौहर रज़ा, कुलदीप सलिल, राणा प्रताप गन्नौरी, के.के.ऋषि, दिनेश दधीचि, सही राम, मनजीत राठी, श्याम वशिष्ठ ‘शाहिद’ और मनोज सहरावत ‘दरवेश’ ने हरियाणा भर से पहुँचे श्रोताओं की उपस्थिति में अपने समय और समाज की कड़वी सच्चाइयों पर उम्दा रचनाएँ पेश कीं।

                मुशायरे की शुरुआत में आबिद आलमी यादगार कमेटी के संयोजक प्रिंसिपल (सेवानिवृत्त) महावीर शर्मा ने चसवाल साहब के जीवन पर रौशनी डालते हुए उन के बहुआयामी व्यक्तित्व की कई परतें खोलीं। अपने निजी जीवन में बिल्कुल सादा और हर प्रकार के आडम्बर और दिखावे से दूर रहने वाले चसवाल साहब अंग्रेज़ी के समर्पित प्राध्यापक थे। अपने कर्तव्य का पूरी निष्ठा और लगन से निर्वहन करने वाले चसवाल साहब हरियाणा के भिवानी, महेन्द्रगढ़, रोहतक, गुडग़ाँव इत्यादि स्थित राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन करने के साथ-साथ हरियाणा राजकीय प्राध्यापक संघ के अग्रगामी संगठनकर्ता भी रहे। जो भी किया पूरे दिल से किया – बेहतरीन प्राध्यापक तो थे ही, उतने ही बेहतरीन संगठनकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। वे हरियाणा जनवादी सांस्कृतिक मंच के संस्थापकों में से एक थे और हरियाणा जनवादी लेखक संघ के प्रधान भी रहे। उस समय की जनवादी पत्रिका ‘प्रयास’ (जो बाद में ‘जतन’ के नाम से छपी) में वे सम्पादन सहयोगी रहे। भिवानी-स्थित शहीद भगत सिंह अध्ययन-केन्द्र की स्थापना में उन की सक्रिय हिस्सेदारी शैक्षणिक, सामाजिक आन्दोलन में उन के अग्रणी योगदान की एक मिसाल है। महावीर शर्मा जी ने उन की रचनाओं से कुछ पंक्तियाँ भी सब के सामने रखीं –

कुछ बात है कि लौट के सूरज न आ सका
एक बार उस पहाड़ के पीछे उतर के देख।

इस मुशायरे का बहुत ही प्रभावशाली संचालन प्रो. (सेवानिवृत्त) सुधीर शर्मा ने किया। शायरों के परिचय के साथ-साथ उपयुक्त टिप्पणियाँ करते हुए उन्होंने श्रोतागण के लिए मुशायरों के माहौल का समाँ बांधा।

मुशायरे में नए और पुराने,बहुत अनुभवी और कुछ ही सालों से लिखने वाले, दोनों तरह के शायर थे। कुलदीप सलिल जी आबिद आलमी की याद में आयोजित लगभग हर मुशायरे में आते रहे हैं। हमेशा की तरह उन्होंने ध्यान आकर्षित करने वाले शे’र पढ़े

हर समय चढ़ के जो बोले वो नशा अच्छा नहीं
आसमाँ पर ही रहे तो वो ख़ुदा अच्छा नहीं

नए पत्ते पेड़ों पे आते रहे, बड़ी गर्दनों वाले खाते रहे
बुढ़ापा घरों में ठिठुरता रहा, मज़ारों पे चादर चढ़ाते रहे

मौसम का रंग, वक़्त की रफ़्तार देख कर
बदला बयान यारों ने दरबार देख कर

गौहर रज़ा साहब ने अपनी लम्बी नज़्म पढ़ी जो मौजूदा हालात पर एक धारदार टिप्पणी भी है। इसी रचना की शुरुआत और अन्त के हिस्से –

नया लिबास पहन कर ये क्यूँ समझते हो
कि सारे ख़ून के धब्बों को तुम छुपा लोगे

जो बस्तियों को जलाते रहे हो बरसों से
उन्हीं की राख है अब तक तुम्हारे चेहरे पे

लिबास कोई भी हो, तन को ढाँप सकता है
ये ज़हन, सोच, तरीक़े छुपा नहीं सकता

नया लिबास पहन कर ये क्यूँ समझते हो
कि सारे ख़ून के धब्बों को तुम छुपा लोगे

उन्हीं द्वारा पढ़ी गई एक और रचना का यह अंश-

अंधे कुएँ में झूठ की नाव तेज़ चली थी मान लिया
लेकिन बाहर रौशन दुनिया सच तुम से बुलवाएगी

राणा प्रताप ‘गन्नौरी’ जी ने ये शे’र पढ़े –

तेरी निगाह देखती है बाहर से
मेरा वुजूद तो टूटा हुआ है अन्दर से

मेरी याद्दाश्त दे जाती है धोखा
मेरा रखा हुआ सामाँ न ढूँढ़ा जाए है मुझ से

कौन सुनेगा मेरी नाज़ुक सी आवाज़
दुनिया ज़ोरों से आवाज़ें कसती है

बरबादी में देर नहीं लगती ‘राणा’
बस्ती बस्ते बस्ते बस्ती है

‘गन्नौरी’ साहब ने कालिदास के ‘मेघदूत’ के एक अंश का अनुवाद भी सुनाया और गायत्री मंत्र का भी और इक़बाल के ‘शिकवा’ और ‘जवाब-ए-शिकवा’ की याद दिलाते हुए मुलतानी में ईश्वर से अपने ‘शिकवा’ के अंश भी पेश किए।

के.के.ऋषि साहब आबिद आलमी के साथ के शायर रहे हैं। उन्होंने पानी की अहमियत पर यह रचना पढ़ी –

जिस जगह भी बिखर गया पानी
जान मिट्टी में भर गया पानी।

फूट निकले हयात [जीवन] के चश्मे
जिस तरफ़ भी, जिधर गिरा पानी।

दे गया पैराहन [लिबास, वस्त्र] ज़मीनों को
शादाब [हरा-भर] कर गया ज़मीनों को।

बिगड़ा माहौल तो ये हाल हुआ
ज़ीना-ज़ीना [सीढ़ी-सीढ़ी] उतर गया पानी।

आज देखा जो हाल दरिया का
मेरी आँखों में भर गया पानी।

अब तो कुछ कीजिए बराएकरम
अब तो सर से गुजऱ गया पानी।

और ये भी कहा उन्होंने:

न आज होगा न कल रहा है
ज़माना करवट बदल रहा है

तुम अपना कुनबा बचा के भागो
ये शहर गाँव निगल रहा है

अब उस की कि़स्मत में ठोकरें हैं
जो सीधे रस्ते पे चल रहा है

कितनी देर और बहारों को पुकारा जाए
कोई मौसम हो गुलिस्ताँ को सँवारा जाए

इस से पहले कि कोई कहर फ़लक से टूटे
जो भी है कजऱ् ज़मीं का वो उतारा जाए

दिनेश दधीचि जी ने बहुत ही सटीक लेकिन प्रभावी तरीके से आज के हालात पर अपनी बात रखी

माहौल हो तारीक, तो क्या ठीक रहेगा?
पकड़े रहें हम लीक, तो क्या ठीक रहेगा?

ख़ुद मेरा ही दिल जिस की नहीं देता गवाही
दुनिया जो कहे ठीक, तो क्या ठीक रहेगा?

वादा उस का इक मज़बूत इरादा था
आज मगर वो बोला, ‘अच्छा, देखेंगे!’

बात करती है नजऱ, होंठ हमारे चुप हैं
यानी तूफ़ान तो भीतर है, किनारे चुप हैं

उन की ख़ामोशी का कारण था प्रलोभन कोई
और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं

आँख निरंतर खुली रखेंगे तब जा कर
एक सुनहरे कल का सपना देखेंगे

व्यंग्यकार एवं स्तम्भ-लेखक सही राम ने फ़ासीवाद के विभिन्न रूप दिखाती लम्बी नज़्म ‘राष्ट्रवाद का पाठ’ पढ़ी।

कजऱ् में डूब रहे किसान
आत्महत्या का ले वरदान
धरती दे दो सेठों को
मज़दूर बना दो बेटों को

मनजीत राठी ने विशेष तौर से महिलाओं के नज़रिए से अपनी बात कही और जातीय उन्माद और गरीबी की भी बात की:

ये माना कमज़ोर हूँ मैं
सत्ता से कोसों दूर हूँ मैं
लेकिन मेरी भी हस्ती है
मैं सागर में इक बूंद सही
ये बूंद भी मायने रखती है

और

जातीय हुंकार से पामाल हुआ जाता है
आदमी का देखिए क्या हाल हुआ जाता है
झुक रही है हर कमर मुफ़्िलसी के बोझ से
लहू का रंग पीला, भूख का लाल हुआ जाता है

 श्याम वशिष्ठ ‘शाहिद’ द्वारा पढ़े गए कुछ शे’र:

ज़ख़्म लगे हैं हम को तो ये काम नहीं है ख़ारों का
अन्दाज़ा था ग़लत हमें कुछ फूलों के किरदारों का

जि़न्दगी से मात खाना छोड़ दो
क़ातिलों को आज़माना छोड़ दो

अपने घर में रोशनी के वास्ते
दूसरों के घर जलाना छोड़ दो

ख़ाली हाथ सिकन्दर देख
देख वक़्त के तेवर देख

ढूँढ़ रहा है जिस को बाहर
उस को अपने अन्दर देख

मनोज सहरावत ‘दरवेश’ का यह शे’र विशेष तौर पर ध्यान अपनी तरफ़ खींचता है –

ऐ मेरे हौसलो उठ कर छू जाओ बुलंदियों को
अभी तो कुछ कम ही ज़माने ने हाथ आज़माए हैं

 दिनेश दधीचि ने अपने उस्ताद जनाब राम नाथ चसवाल ‘आबिद आलमी’ को उन्हीं की याद में हो रहे मुशायरे में याद करते हुए समर्पित की अपनी इस रचना में दिनेश जी ने आबिद आलमी के कई रंगों को समेट लिया है।

आज तक जैसे-तैसे टाला है
तीर तरकश से अब निकाला है

है ये दावत अजीब क्या जानें
कौन किस का यहाँ निवाला है

किस की दस्तक है ये अन्धेरों में
दर पे शायद खड़ा उजाला है

लाल बत्ती है कार पर उन की
कारनामों का रंग काला है

इक सलीक़ा है अपने ग़ुस्से में
हम ने गज़़लों में उस को ढाला है

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज 61-62

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