शब्द हमें बेसहारा नहीं होने देते: सुरजीत पातर

शब्द हमें बेसहारा नहीं होने देते: सुरजीत पातर

◊ कपिल बतरा

पंजाबी के प्रसिद्ध रचनाकार एवं पद्मश्री सुरजीत पातर ने हरियाणा सृजन उत्सव’ का उद्घाटन किया। उन्होंने प्रदेश भर से आए सृजनकारों को धरती से जुड़ने का आह्वान किया।  ‘अमड़ी मैंनू आखण लगी, तू धरती का गीत रहवेंगा, तू पद्मश्री होके भी मेरा सुरजीत रहवेंगा’। पंजाबी कहावत के ज़रिए बोलचाल के असर को बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने एक शेर- ‘संताप को गीत बना लेना मेरी मुक्ति दा एक राह तो है- के ज़रिए लफ्ज़़ों की महत्ता को प्रतिपादित किया।

 

बंदा अन्न-पाणी से नहीं बल्कि बोल-बाणी से भी पलता है।

शब्द एक पावन चीज़ है। शब्द हमें बेसहारा नहीं होने देते। पातर ने अपनी गज़़ल ‘उदास दोस्तों आवो मिलके खुश होइए, मिलण बगैर उदासी दा कोई चारा नहीं’ के ज़रिए आपसी मेलजोल का अहसास कराया। उन्होंने ख़लील जि़ब्रान का वाक्य उद्धृत करते हुए कहा कि ‘हमारे महान गायक वे हैं जो हमारी ख़ामोशियों को गाते हैं।’ इसके अलावा पद्मश्री सुरजीत ने ‘मैं यहां हूं रात को रात समझने वाला, है कोई यहां मेरी बात समझने वाला’

लेखक-साहित्यकार समाज की आंख होते हैं। शब्दों के माध्यम से वे समाज के उपेक्षित लोगों के दर्द को बयां करते हैं। गूंगे लोगों की आवाज बनते हैं। कला और साहित्य हर समय में यह काम करते आए हैं। बुल्लेशाह, कबीर, फरीद, नानक सहित रचनाकारों ने अपने समय की चुप्पी को तोड़ा। कला और साहित्य कभी भी खामोश नहीं होते। वे अपने कहने का तरीका बदल सकते हैं।

संघर्षों की धरती पंजाब खुदकुशियों की धरती कैसे बन गई। संघर्ष, बलिदान, ख़ुदकुशियों की धरती तब बनती है जब इन्सान खुद को अकेला महसूस करने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में साहित्य और कविता की ज़िम्मेदारी शुरू होती है। बातों और ख़यालों में रोशनी का होना ज़रूरी है। रचनाकार देश व समाज की आत्मा बुनते हैं। आज रचनाकारों और कलाकारों की जिम्मेदारी है कि वे अपने सृजन को जनता के साथ जोड़ें ताकि वह संघर्षों में अपने आप को अकेला महसूस ना करे। शायरी का काम बंदे को पत्थर व मशीन बनने से बचाना और उसके अहसास को जि़न्दा रखना है।

किदर गया

“होंदा सी इत्थे शख्स़ इक सच्चा जाणे किदर गया
जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई-
जद दो दिलां नूं जोड़दी एक तार टुट गई,
साजिंदे पुछदे साज नूं नग़मा किदर गया,
सब नीर होए गंदले, शीशे होए धुंधले इस तरह
हर शख्स़ पुछदा हे, मेरा चेहरा किदर गया
सिक्खां, मुसलमाना ते हिंदुआं दी पीड़ विच
रब ढूंढदा फिरदा, मेरा बंदा किदर गया
दुःख दी ज़मीं नू पुछदा अल्लाह किदर गया
पातर नू जाण-जाण के पुछदी है आज हवा
रेतां ते तेरा नाम लिख्या सी, जाणे किदर गया

पत्थर हो गया

एक लरज़ता नीर सी ओ मर के पत्थर हो गया
दूसरा इस हादसे तों डर के पत्थर हो गया

तीसरा इस हादसे नूं करण लग्गा सी बयान
ओ किसे पत्थर दे घूरण करके पत्थर हो गया

एक शायर बच रह्या संवेदना संग लरजदा
इन्ने पत्थर ओ तां गिणती करके पत्थर हो गया


कुछ किहा तो हनेरा जरेगा किवें,
चुप रिहा तो शमादान कि कहणगे।

गीत दी मौत जे इस रात हो गई,
मेरा जीणा मेरे यार किंझ सहण गे।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 23

 

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