पारिस्थितिक संकट और समाजवाद का भविष्य – डा. कृष्ण कुमार

पठनीय पुस्तक ‘यह पृथ्वी मेरी और सब की है और यह हमारे अस्तित्व की पहली शर्त है। इस पृथ्वी को मोल तोल की एक वस्तु के रूप में तबदील करना स्वयं को मोलतोल की वस्तु में तबदील करने की ओर आखिरी कदम है।- एंगेल्स आज विश्व के सामने पारिस्थितिक संकट एक गंभीर चुनौती है। अंतर्राष्ट्रीय […]
रेत से प्रौद्योगिक क्रांति की ओर – अविनाश उपाध्याय
विज्ञान-प्रौद्योगिकी सन् 1947 में जब भारत आजादी की क्रान्ति में संलग्न था, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक असाधारण क्रांति हुई। सन् 1947 में बेल लैबोरेटरी में पहली बार सॉलिड स्टेट ट्रांजिस्टर का निर्माण किया गया। इसको बनाने वालों का नाम था जॉन बारडीन, वॉल्टर ब्रेटेन, और विलियम शॉक्ले। इन्होंने पहली बार जरमेनियम तत्त्व का प्रयोग […]
चिड़िया – बी मदन मोहन

बाल कविता चिड़िया मेरे घर की छत पर रोज फुदकती है रुक-रुक अपनी भाषा में जाने क्या बोला करती है टुक-टुक। उसकी बोली को सुन-सुनकर नन्हें चूजे आ जाते आंगन में बिखरे दानों को चीं-चीं करते खा जाते शैतानी करते मनचाही मां के पीछे लग जाते पंक्ति बांध के चलते, जैसे रेल का इंजन छुक-छुक-छुक। […]
गैस गुबारा – बी. मदन मोहन

बाल कविता मैं हूं गैस गुबारा भैया ऊंची मेरी उड़ान नदियां-नाले-पर्वत घूमूं फिर भी नहीं थकान बस्ती-जंगल बाग-बगीचे या हो खेत-खलिहान रुकता नहीं कहीं भी पलभर देखूं सकल जहान उड़ते-उड़ते गया हिमाचल देखा एक स्कूल नीचे था एक झरना बहता, महक रहे थे फूल ऊंची-नीची घाटी थी और मौसम था प्रतिकूल फिर भी पुस्तक लिए […]
पवित्र किताब की छाया में आकार लेता जनतंत्र – सुभाष गाताड़े

हलचल डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान, कुरुक्षेत्र द्वारा 26 जून 2016 को डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल स्मृति व्याख्यान-7 का आयोजन किया। विषय था ‘भारतीय लोकतंत्र: दशा और दिशा’। इसकी अध्यक्षता प्रो. टी. आर. कुण्डू ने की। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के तौर पर प्रख्यात विचारक सुभाष गाताड़े ने जो वक्तव्य उसके अंश यहां प्रस्तुत हैं। […]
आमूल-चूल परिवर्तन की खातिर – नुसरत
सांस्कृतिक हलचल 29 मई को यमुनानगर जिले का गांव टोपरा कलां गांव क्रांतिकारी जय भीम के नारों से गूंज उठा। जिधर देखिये उधर से जय भीम के नीले झंडों के साथ जोशीले नौजवान,महिलाओं व बच्चों का हुजूम चला आ रहा था। टोपरा कलां में हुआ भीम गर्जना कार्यक्रम अांबेडकर युवा मंच(एवाईएम) की अगुवाई में जनवरी […]
ब्राह्मणवाद के खिलाफ हुई भीम गर्जना – धर्मवीर
सांस्कृतिक हलचल 29 मई को यमुनानगर जिले का गांव टोपरा कलां गांव क्रांतिकारी जय भीम के नारों से गूंज उठा। जिधर देखिये उधर से जय भीम के नीले झंडों के साथ जोशीले नौजवान,महिलाओं व बच्चों का हुजूम चला आ रहा था। टोपरा कलां में हुआ भीम गर्जना कार्यक्रम अंाबेडकर युवा मंच(एवाईएम) की अगुवाई में जनवरी […]
आबिद आलमी यादगार मुशायरा – अविनाश सैनी
सांस्कृतिक हलचल ‘आबिद आलमी’ (‘आबिद’ यानी तपस्वी, और ‘आलमी’ यानी इस दुनिया का), अपना यह तख़ल्लुस यानी कवि-नाम रखा था अपने वक़्त के जाने-माने शिक्षक और हरियाणा में शिक्षक-आंदोलनों के पहली पंक्ति के सिपाही जनाब राम नाथ चसवाल ने। इसी नाम से वे शायरी किया करते थे और इसी शायर की याद में सातवाँ’आबिद आलमी […]
कबीर का नजरिया
कबीरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ जो घर जालैआपना वो चलै हमारे साथ 20 जून 2016 को कबीर जयंती के अवसर पर ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल अध्ययन संस्थान,कुरुक्षेत्र में ‘कबीर का नजरिया’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की। परिचर्चा के लिए कबीर साहित्य व दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान डा. सेवासिंह […]
‘लोकनाद’ का पैगाम : अनुभव व सबक – मोहन रमणीक
सांस्कृतिक हलचल 24 अप्रैल 2016 को रोहतक के डेंटल कॉलेज ऑडिटोरियम में अहमदाबाद की संस्था ‘लोकनाद’ से चारुल और विनय की गायक जोड़ी ने ‘सप्तरंग’ द्वारा आयोजित प्रोग्राम में उपस्थित लोगों के बीच गाए अपने गीतों से बहुत कुछ साबित कर दिया। वाद्य-यन्त्र के नाम पर बस एक डफ, हाथों से बजते घुंघरू, और […]
प्यार का पैगाम – महेंद्र सिंह ‘फकीर’
गीत धरती पर फैला दो, ये प्यार का पैगाम लव तो लव है इसमें, जेहाद का क्या काम ऐ जवानों करो बगावत इस माहौल के खिलाफ मानवता के दुश्मनों को करना कभी मत माफ भगत सिंह ने पिया था, पी लो वो ही जाम छुरी लहराने वाले क्यूं पा रहे सब मान फूल खिलाने वाले […]
कौन बनेगा अमेरिका का राष्ट्रपति – महावीर शर्मा
सामयिकी पूरी दुनिया की नजर अमरीका पर है, ऐसा हर दस साल बाद होता है। नवम्बर 2014 में अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव होना है। अभी पद की उम्मीदवारी के चयन के लिए चुनाव अभियान चल रहा है। जुलाई अंत तक दोनों पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवार चुन लेंगी। इस पूरे अभियान में विश्व के जनमानस की गहरी […]
हीलियम – ललित कार्तिकेय
कहानी छोटे कद, सांवली रंगत और पेज कट बालों वाली उस लड़की में सेवेन्टी एमएम दिमाग था और दिमाग में ईस्टमैन कलर का एक सपना! सपना कोई स्थिर चित्र नहीं था कि वह खुद या कोई और उसे अंतिम रूप से एक ही बार में बयान कर सकता। वो एक फिल्म की मानिंद था- बहते […]
ललित कार्तिकेयः एक अशांत अदीब की खामोश मौत – ज्ञान प्रकाश विवेक
संस्मरण ललित कार्तिकेय का जन्म हरियाणा के सारन में हुआ। उन्होंने ‘हिलियम’, ‘तलछट का कोरस’, कहानी संग्रह, ‘सामने का समय’, आलोचना तथा देरिदा की ‘स्पेक्टर्स ऑफ माक्र्स’, सलमान रशदी के उपन्यास ‘शरम’ तथा शिव के. कुमार के उपन्यास ‘तीन किनारों वाली नदी’ का अनुवाद किया। वे हरियाणा प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव रहे। ‘अथ’ पत्रिका […]
ऊधम सिंह तेरे नाम का – मनोज पवार ‘मौजी’
रागनी भारत तै चल लंदन पोहंच्या, दिल भर रया इंतकाम का दुनिया के म्हं रुक्का पाट्या, ऊधम सिंह तेरे नाम का जलियांवाळे बाग की घटना, पूरी दिल पै ला ली रै खून का बदला खून तै लेऊं, या ए कसम उठा ली रै उस डायर नै छोडूं ना, जो मुजरिम कत्लेआम का दुनिया के म्हं […]
जलियांवाळे बाग का मंजर – मनोज पवार ‘मौजी’
रागनी मेरी भोळी सूरत कांब गई, मैं छोड़ रै आपणी धीर गया जलियांवाळे बाग का मंजर, मेरा काळजा चीर गया दन-दनादन गोळी चाली, दुश्मन के औजारां तै नर अर नारी भून दिए सब, गोळी की बौछारां तै मौत का नंगा नाच करिणयो, कित रै थारा जमीर गया कोए मर्या पड़्या, कोए डर्या पड़्या, कोए पड्य़ा-पड़्या […]
ऊधम सिंह नै सोच समझ कै – रणबीर सिंह दहिया
रागनी ऊधम सिंह नै सोच समझ कै करी लन्दन की जाने की तैयारी।। राम मुहम्मद नाम धरया और पास पोर्ट लिया सरकारी।। किस तरियां जालिम डायर थ्यावै चिन्ता थी दिन रात यही बिना बदला लिये ना उल्टा आऊं हरदम सोची बात यही उनै मौके की थी बाट सही मिलकै उंच नीच सब बिचारी।। चौबीस घण्टे […]
धांय धांय धांय होई उड़ै(शहीद उधम सिंह) – रणबीर सिंह दहिया
रागनी धांय धांय धांय होई उड़ै दनादन गोली चाली थी। कांपग्या क्रैक्सटन हाल सब दरवाजे खिड़की हाली थी।। पहली दो गोली दागी उस डायर की छाती के म्हां मंच तै नीचैं पड़ग्या ज्यान ना रही खुरापाती के म्हां काढ़ी गोली हिम्माती के म्हां खतरे की बाजी टाली थी।। लार्ड जैट कै लागी जाकै दूजी गोली […]
पीड़ा का सन्तोष – सुशीला बहबलपुर
कविता पीड़ाओं में जो पैदा हुए पीड़ाओं में जिनका बचपन गुजरा पीड़ाओं में ही रखे जिसने जवानी की दहलीज पर कदम पीड़ाओं में ही रहकर समझा पीड़ाओं के कारण को पीड़ाओं में रह लड़ना-सीखा पीड़ाओं से छुटकारा पाने हेतु पीड़ानाशक सूत्र दे, दूसरों को खुद मरा सन्तोष की पीड़ा स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा […]
न रह जाए सीमित – सुशीला बहबलपुर
कविता लिखना केवल लिखने तक न रह जाये सीमित सोच, सकपकाता है ये मन कहना सिर्फ कहने तक न रह जाए निमित सोच, कचकचाता है ये मन सोचना सिर्फ सोचने पर न रह जाये आलम्बित सोच, घबराता है ये मन स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016) पेज-29
21वीं सदी में
कविता न्यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते एकाएक मेरी नजरें अटक गई उस विचित्र चित्र पर जो घूंघट में फूलों की माला पहने दे रही थी भाषण खड़ी थी विधायक बनने के लिए। जो खुद संस्कारित है समाज के रूढि़ संस्कारों से कैसे चला पाएगी देश को प्रगतिशील विचारों पर मैं पूछती हूं। उन ूुढ़े-बुजुर्गों से जो देते […]
शायद हां – सुशीला बहबलपुर
कविता हां और शायद भी मुश्किल है। किसी चीज को बनाना उसे संवारना व निखारना और फिर उससे भी ज्यादा मुश्किल है। उसे संजो कर रखना। हम ये जानते हैं। यकीनन अगर हम ये जानते हैं। तो फिर जानबूझ कर कब तक यू नाटक करते रहेंगे अनभिज्ञ बने रहने का! स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस […]
स्टैण्ड – सुशीला बहबलपुर
कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते हैं सिद्धांत भी संघर्ष से सटे रास्ते पर चलने के लिए। मगर नहीं ले पाते वो स्टैण्ड अपने जीवन सम्बन्धी नहीं कर पाते तर्क-वितर्क वो। […]
सच कहूं – सुशीला बहबलपुर
कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के इन्सान में भी है काफी अन्तर झकझोरता है बार-बार अन्दर का इन्सान नहीं है कुछ भी अस्पृश्य प्रगतिशील इन्सान के लिए। पर! रोकता है टोकता है बार-बार मुझे […]