दिनेश दधीचि की रचनाएं

सोचो

सोचो, सही-ग़लत को ले कर
नोक कलम की पैनी क्यों हैं?
बाज़ अगर हैं बेक़ुसूर तो
चिड़ियों में बेचैनी क्यों हैं?

गजल

बात करती हैं नज़र, होंठ हमारे चुप हैं.
यानि तूफ़ान तो भीतर हैं, किनारे चुप हैं.

उनकी चुप्पी का तो कारण था प्रलोभन कोई
और हम समझे कि वो ख़ौफ़ के मारे चुप हैं.

बोलना भी है ज़रूरी साँस लेने की तरह
उनको मालूम तो है, फिर भी वो सारे चुप हैं.

भोर की वेला में जंगल में परिंदे लाखों
है कोई खास वजह, सारे के सारे चुप हैं.

जो हुआ, औरों ने औरों से किया, हमको क्या?
इक यही सबको भरम जिसके सहारे चुप हैं.

2

इस तरह उनसे बढ़ाएँ मेरी दूरी ग़ज़लें
उनको ज़िद है कि कहूँ मैं भी अँगूरी ग़ज़लें.

आम कोयल के लिए, मिर्च हैं मिट्ठू के लिए,
काले कागा की मुँडेरों की हैं चूरी ग़ज़लें.

सिलसिला बातों का उनसे कभी मुमकिन ही नहीं
वो ये कहते हैं भला क्यों हैं ज़रूरी ग़ज़लें ?

श्वेत औ’ श्याम नहीं और ये रंगीं भी नहीं
कत्थई रंग की मिट्टी-सी हैं भूरी ग़ज़लें.

दस्तकें उनकी सुना करता हूँ मैं रातों को
मुझको सोने नहीं देती हैं अधूरी ग़ज़लें.

पैदा होना ही तो मरना है तभी कागज़ पर
जब लिखी जायं तो हो जाती हैं ‘पूरी’ ग़ज़लें.

तख्ते-ताऊस समझता है इसे गुस्ताखी
नाचती मोर की खातिर हैं मयूरी ग़ज़लें.

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 29

 

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