इतिहास

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में यमुना नदी के किनारे एक शहर की स्थापना दसवें पातशाह साहिब श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा हुई थी। इस शहर को पांवटा साहिब के नाम से जाना जाता है, जिसका कारण गुरु जी के पांव/चरणों का उस स्थान पर पडऩा था। गुरुद्वारा पांवटा साहब के नाम से वहां पर एक एतिहासिक और भव्य गुरुद्वारा सुशोभित है।

पांवटा साहिब से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर एक और ऐतिहासिक गुरुद्वारा है, भंगाणी साहिब। भंगाणी उस स्थान का नाम है, जहां सन् 1686 में पहाड़ी राजाओं के गठजोड़ और गुरु गोबिन्द सिंह  के बीच एक लड़ाई हुई थी, जिसमें गुरु गोबिन्द सिंह जी अपने करीब चार हजार अनुयायियों के साथ पहाड़ी राजाओं की करीब  तीस हजार की फौज पर भारी पड़े थे।

सन् 1666 में जन्में गुरु गोबिन्द सिंह जी मात्र 9 वर्ष के थे, जब उन्होंने अपने पिता नौवें गुरु तेग बहादुहर की शहादत का 1675 में अहसास किया। तदुपरांत आनन्दपुर साहिब में उनकी बढ़ती लोकप्रियता और गतिविधियां इस इलाके के राजा भीमचंद को रास नहीं आ रही थी। दूसरे पहाड़ी राजा भी राजा भीमचंद की तरह खतरा महसूस करने लगे थे, क्योंकि गुरु गोबिन्द सिंह ने अपनी फौज तैयार करनी शुरू कर दी थी, जिनमें 500 पठान भी शामिल थे। पहाड़ी हिन्द राजपूत राजाओं को दूसरी बड़ी चिढ़ इस बात की थी कि निम्र जाति के लोग तेजी से गुरु गोबिन्द सिंह के जातिविहीन समुदाय की ओर आकर्षित होने लगे थे और इस प्रकार उनका सिर उठाकर जीने का प्रयास उन राजाओं को फूटी आंख भी नहीं सुहा रहा था। जब अनेक प्रकार की धमकियों का कोई असर नहीं हुआ तो उन राजाओं ने सामूहिक रूप से मिलकर पहले गुरु गोबिन्द सिंह से जुड़े हुए अधिकतर पठान सिपाहियों को खरीदा और फिर हमला कर दिया। उल्लेखनीय है कि इस हमले से पहले गुरु गोबिन्द सिंह के कैंप में रहने वाले अधिकतर  उदासी अनुयायी भी उन्हें छोड़ कर चले गए थे। ये भंगाणी की लड़ाई थी, जिसमें गुरु गोबिन्द सिंह  को जीत हासिल हुई।  इस लड़ाई का एक दिलचस्प अध्याय है-पीर बुधू शाह। सिख इतिहास पर लिखी गई अनेक पुस्तकों व सढौरा में स्थित गुरु द्वारा जन्म स्थान पीर बुद्धू शाह द्वारा प्रकाशित पुस्तक से हमें इस संबंध में रोचक व ज्ञानवर्धक जानकारियां मिलती हैं। कहा जाता है कि पीर बुद्धू शाह सैयद खानदान में पैदा हुए थे, जिस खानदान में हजरत मोहम्मद की सबसे छोटी बेटी की शादी हुई थी।

गुरु नानक देव जी की मक्का मदीना व बगदाद की उदासी (यात्रा) के दौरान उनसे प्रभावित होकर करीब 200 परिवार वहां से पंजाब में आकर बस गए थे। इन्हीं परिवारों  में वक्त के साथ साईं मियां मीर (जिनके हाथों स्वर्ण मंदिर अमृतसर की नींव रखी गई थी), पीर भूरे शाह, शाह हुसैन और पीर बुद्धू शाह जैसे लोकप्रिय सूफी फकीर हुए।

पीर बुद्धू शाह का असली नाम बदरूदीन था, जिनके बुजुर्ग शाह कयूम कादरी 15वीं शताब्दी में बगदाद से आकर सढोरा में बस गए थे। सन् 1647 में पैदा हुई बदरूदीन पटियाला जिले में स्थित घड़ाम के पीर भीखण शाह के शागिर्द बन गए और इन दोनों का 9वें गुरु तेग बहादर जी से काफी मेलजोल था। जब गुरु गोबिन्द सिंह पांवटा साहिब आए, तो पीर बुद्धू शाह और गुरु गोबिन्द सिंह का मेलजोल बढ़ गया  और पीर बुद्धू शाह की सिफारिश पर गुरु गोबिन्द सिंह ने 500 पठानों के दस्ते को अपने साथ मिलाया था। इन पठानों के सरदार औरंगजेब की नाराजगी के शिकार इन पठानों को कोई भी राजा या नवाब अपनी फौज में मिलाने की हिम्मत नहीं कर रहा था।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि पहाड़ी राजाओं ने गुरु गोबिन्द सिंह जी पर हमला करने से पहले अधिकतर पठानों को धन और लूट के बहाने अपने साथ मिला लिया था। जब पीर बुद्धू शाह को पठानों के पासा पलटने की खबर मिली तो वे तुरन्त अपने चार पुत्रों, दो भाइयों और 700 अनुयायियों के साथ सढोरा से  चलकर गुरु गोबिन्द सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े। इस लड़ाई में गुरु की फौज को जीत तो हासिल हुई, लेकिन पीर बुद्धू शाह के दो पुत्र अशरफ शाह और मोहम्मद शाह व भाई भूरे शाह शहीद सहित 500 अनुयायी शहीद हुए।

लड़ाई के उपरांत तोहफे के तौर पर पीर बुद्धू शाह की मांग पर गुरु गोबिन्द सिंह ने उन्हें अपनी पगड़ी, एक छुरी और केश फंसे हुए अपना कंघा भेंट किया। भाई काहन सिंह नाभा ने ‘महान कोष’ में लिखा है कि नाभा के महाराजा भरपूर सिंह (1840-1860) ने कीमती तोहफे व जागीर देकर ये निशानियां पीर बुद्धू शाह के वंशजों से लेकर नाभा रियासत के गुरुद्वारा सिरोपाव में गुरु गोबिन्द सिंह की अन्य निशानियों  के साथ सम्मानपूर्वक टिका ली गई।

सन् 1701-04 के दौरान आनन्दपुर साहिब में पहाड़ी राजाओं व मुगल फौजों के साथ गुरु गोबिन्द सिंह का तनाव बढ़ा तो सरहन्द के सुबेदार वजीर खां के हुक्म से सढौरा के दरोगा उस्मान खां ने 1704 में पीर बुद्धू शाह की सारी जायदाद को आग लगा दी व छतबीड़ के जंगलों  में ले जाकर पीर के शरीर के पुर्जे-पुर्जे करके उन्हें मार डाला गया। सन् 1709 में पीर बुद्धू शाह की मौत का बदला बंदा सिंह बहादुर ने उस्मान खां को मारकर व सढोरा को तहस-नहस करके लिया।

राजपूत राजाओं द्वारा गुरु गोबिन्द सिंह का विरोध, पीर बुद्धू शाह द्वारा अपने बेटों, भाई, अनुयायियों और आखिर में अपनी जान को गुरु गोबिन्द सिंह के लिए कुर्बान कर देना आदि कुछ ऐसे पहलू हैं जो किसी न किसी वजह से अनछुए रहते हैं। शायद इसका मुख्य कारण लगातार इतिहास को एक पक्षीय रंग देने का प्रयास रहा है।

 संदर्भ :
1. ए हिस्ट्री ऑफ सिखस्, खुशवंत सिंह
2. संक्षित इतिहास गुरुद्वारा जन्म स्थान पीर बुद्धूशाह जी सढोरा साहिब (गुरुद्वारा द्वारा प्रकाशित पुस्तिका)
3. बंदा सिंह बहादुर एंड सिख सोवरेंटी, सम्पादन हरबंस कौर
4. द सिखस् देयर जर्नी ऑफ फाईव हंडरड ईयर, राजपूत सिंह
5. द सिखस् इन्साईक्लोपेडिया
6. महान कोष द्वारा भाई कहान सिंह नाभा
7. साहब-ए-कमाल गुरु गोबिन्द सिंह, लेखक दौलत राय

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मार्च-अप्रैल 2016) पेज-86-87

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