कविता न्यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते एकाएक मेरी नजरें अटक गई उस विचित्र चित्र पर जो घूंघट में फूलों की माला पहने दे रही थी भाषण खड़ी थी विधायक बनने के लिए।
कविता न्यूज पेपर पढ़ते-पढ़ते एकाएक मेरी नजरें अटक गई उस विचित्र चित्र पर जो घूंघट में फूलों की माला पहने दे रही थी भाषण खड़ी थी विधायक बनने के लिए।
कविता हां और शायद भी मुश्किल है। किसी चीज को बनाना उसे संवारना व निखारना और फिर उससे भी ज्यादा मुश्किल है। उसे संजो कर रखना। हम ये जानते हैं।
कविता जाने कितने ही लोग आते हैं। संघर्ष के रास्ते पर बदलते अपना जीवन जो सिर्फ चाहते हैं खुद के साथ-साथ बदलना समाज को लेकिन कुछ नियम कानून-कायदे व होते
कविता जी चाहता है मन करता है आज बार-बार खोल के रख दूं अपने अन्दर का इन्सान जिसमें हैं खामियां काफी अन्दर के इन्सान और बाहर के इन्सान में भी
कविता खतरनाक होता है सिर्फ अपने लिए जीना और सब तरह की बेपरवाही उससे भी खतरनाक है आधार से कट जाना सिर्फ अपनी ही बात करना पर सबसे खतरनाक होता
कविता कर दिये गए थे हाथ तेरे पीले होते-होते किशोर बिना जाने तेरी मंशा शायद नहीं था पता तुझे अर्थ इस गृह बन्धन का वो बिखरी-बिखरी खुशियां वो रिश्ते की
तुम चुप रहो कोई बात नहीं लेकिन मैं चुप रहूं। ये अच्छी बात नहीं। क्योंकि मेरा चुप रहना तोड़ सकता है। आपकी खामोशी जिसकी नहीं है जरूरत शायद अभी। स्रोतः
कविता कितना सुंदर, दर्द भरा व निराला है शब्दों का खेल इस प्राणी जगत में अगर शब्द न होते तो कुछ न होता ज्ञान, संज्ञान से हम होते अनभिज्ञ न
कविता क्यों मढ़ देते हो तुम दोष बार-बार उस अन्जान पर जिसने नहीं सुनी कभी ज्ञान की बात जिसने नहीं पढ़ी कभी ज्ञानवर्धक किताब जो नहीं बैठी कभी ज्ञानी पुरुषों
आलेख महान लेखक प्रेमचंद के साहित्य से हर कोई परिचित है। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिकशक्तियों की टकराहट-संघर्ष-आंदोलन स्पष्टत: मौजूद हैं। विकास नारायण राय का प्रस्तुत विशेष आलेख प्रेमचंद की
परिचर्चा किसी व्यक्ति व समाज की बेहतरी में पुस्तकोंं की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन पुस्तक पठन-अध्ययन-मनन की संस्कृति पर मंडराते खतरे की चिंता निरंतर यत्र-तत्र सुनने में आती है। इस
ग़ज़ल कई खुल कर फिरौती ले रहे हैं कई बस चाय पानी ले रहे हैं तुम्हें मालाएं पहनाई जिन्होंने सुनो ! वो लोग फांसी ले रहे हैं करेगा क्यूँ कोई
ग़ज़ल हमारी रूह में शामिल था जि़न्दगी की तरह अभी जो शख्स गया है इक अजनबी की तरह किसी ने बनके समन्दर बिछा दिया खुद को मैं उसमें घुल गया
9 मई 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लेखक सोना चौधरी से छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों
कविता चीरती बेजान हवाएं तोड़ती सलाखें लांघती दुर्गम पहाड़ चूमती शिखर मुस्कराएंगी गाएंगी खिलखिलाएंगी बेटियां कब…? Share this: Share on X (Opens in new window) X Share on
कविता कभी बरबादी के गम में डूबे लाचार, बेबसी का घूंट पीते बूढ़े कभी दुर्याेधन की महत्वाकांक्षा का शिकार धृतराष्ट्र बन जाते बूढ़े कभी द्रोण कभी भीष्म की तरह मूक
कहानी कहने को दिल्ली, पर दिल्ली-हरियाणा बार्डर से सटा गांव। बोली, बाना, रिवाज और लोग सब हरियाणवी। हल्की गर्मियों की सांझ चार बजे का समय है। मोहल्ले में सब अपने
कविता एक रात सपने में मेरे, ‘बाबा साहेब’ आये। दासता से मुक्ति के, मंत्र तीन बताये। पहला मंत्र बड़ा सरल, शिक्षा की तुम करो पहल, शिक्षित बन हर बाधा को,
कविता तड़पता हुआ बचपन, आसमान से बरसती आग, चीथड़ों में बदलते इन्सान, क्या यही सभ्यता है? चीखता हुआ बचपन, पैराशूट से उतरती मौत, अंग भंग हुई तड़पती लिखें, क्या यही
गजल -1 देखो, हमारे हाथों मुल्क का इतना भी न बुरा हाल हो कि शहीदों की रूहों को अपनी कुर्बानी का मलाल1 हो अवाम2 का लहू-पसीना निचोड़ करते हैं ऐश
पठनीय पुस्तक दलित साहित्य के लिए यह शुभ संकेत है कि अब हिंदी में भी लगातार आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हो रहीं हैं। रचना के साथ-साथ आलोचना का यह तादात्मय दलित
हरियाणवी कविता आया फागण लागे नाचण, भरकै मस्ती का घूट होळी म्ह। नार गजबण चढ्या जोबण, सबनै करै शूट होळी म्ह।। बणाकै डान्डा बीच बगड़ म्ह, रोप्या कैर का
चर्चा-परिचर्चा प्रस्तुति – अमन वासिष्ठ 16 अप्रैल को ‘देस हरियाणा’ पत्रिका द्वारा रोहतक में एक परिचर्चा आयोजित की गयी। विषय था -‘हरियाणा में खेती किसानी -अंतर्विरोध और समाधान’। इस