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साखी – अलख1 इलाही2 एक है, नाम धराया दोय। कहे कबीर दो नाम सुनी, भरम3 पड़ो मति कोय।।टेक कहां से आया कहां जाओगे, खबर करो अपने तन की। सतगुरु मिले

साखी – पंडित और मशालची1, दोनों को सूझे नाहि। औरन को करे चांदनी, आप अंधेरा मांई।।टेक पंडित तुम कैसे उत्तम कहाये। चरण – एक जाइनि2 से चार बरन3 भे, हाड़

कविताJune 28, 2018

साखी – पूरब दिशा हरी को बासा, पश्चिम अल्लह मुकामा। दिल में खोजि दिलहि मा खोजे, इहै करीमा रामा।।टेक – म्हारो हीरो हेराणो कचरा में, पांच पचीस का झगड़न में।

साखी – बैस्नों भया तो क्या भया, बूझा नहीं विवेक। छापा तिलक बनाई करि, दुविधा लोक अनेक।। टेक – पंडित छाण पियो जल पाणी, तेरी काया कहां बिटलाणी1। चरण –

संगत  साधु की, नित2 प्रीत कजे जाय। दुर्मति दूर बहावसि3, देखी सूरत जगाय।।टेक – कोई सफा न देखा दिल काचरण – बिल्ली देखी बगला देखा, सर्प जो देखा बिल का।

साखी -ऐसी मति संसार की, ज्यों गाडर1 का ठाठ2। एक पड़ा जेहि गाड़3 में, सबै जाहि तेहि बाट।।टेक -क्यों भूलीगी थारो देस दीवानी क्यों भूलीगी थारो देस हो-चरण -भूली मालन4

साखी – सात दीप नौ खण्ड में, सतगुरु फेंकी डोर। हंसा डोरी न चढ़े, तो क्या सतगुुरु का जोर।। टेक तेरा मेरा मनुवा कैसे एक होई रे। चरण – मैं

साखी – एकै त्वचा हाड़ मूल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा। एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शुद्रा।।टेक साधौ, पांडे निपुन कसाई। चरण – बकरी मारि भेड़ी

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