देस हरियाणा8- Page

296Articles

कविता आफत आफत का क्या पता हुज़ूर जाने कब टपक पड़े… राजधानी में एक बम धमाका हुआ और टूट पड़ी आफत,. रसोई में नमक ख़त्म और हो गया टंटा… क्या

कविता आइये देखें आइये देखें रोज़-रोज़ गिरावट की नित-नयी किस्में.. नाचती हुई नायिका के थिरकते हुए नितम्ब.. और नायक का निगेटिव शेड, हंसोकड़ी.. अवसर की चौपड़ सजाते लोग.. पसरते हुए

कविता विदाई समारोह एक विदाई समारोह देखा। निबटारा देखा। रिश्तों का पिछवाड़ा देखा। कुछ आंसू थे, बेखुशबू के फूल बिछे थे- पर जाते-जाते जाने वाले ने मुड़कर दोबारा देखा। कुछ

कविताJune 19, 2018

कविता वर्जीनिया को पढ़ते हुए एक अदद कमरे की ज़रूरत है एक प्याली कॉफ़ी जहां हो एक प्याली कॉफ़ी और कुछ किताबें कुछ देर का बेबाक लेटना कुछ अन्दरूनी कपड़े

आलोचना गोदान प्रेमचंद का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें उनकी कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची है। गोदान में भारतीय किसान का संपूर्ण जीवन – उसकी आकांक्षा और निराशा, उसकी धर्मभीरुता

लोक कथाJune 19, 2018

हरियाणवी लोक कथा एक गादड़ था, वो अपणा चौंतरा बणा कै, लीप-पोत कै, साफ-सुथरा राख्या करता। वो अपणा रोब भोत राख्या करता। वो न्यू जाणता के सारा जंगल तेरा कह्या

कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों

कविताJune 19, 2018

 कविता बाप लिखवादे मियरो नाम, स्कूल में पढण कू जाउंगों। मैं करूगों कड़ी मिहनत बाप , स्कूल में फस्र्ट आउंगों।। बेकदइन बकरीन ने, मैं चराणकू नही जाउगों। दिवादे कापी किताब

आलेख                 अगर आंकड़ों की नजर से देखें तो 1991 से लागू उदारीकरण, वैश्वीकरण व नीजिकरण की नीतियों के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है।

रागनी हमेशा चिंता में गात रहा न्यूए दसौटा काट्या, कद आया बचपन कद आई जवानी कोन्या बेरा पाट्या (टेक)   घास ल्याणा सान्नी-सपान्नी सदा काम में हाथ बटाणा, गधे चराके,

 (प्रख्यात कथा लेखिका कृष्णा सोबती को वर्ष 2017 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।  प्रस्तुत है आज की देश की सबसे ज्वलंत समस्या पर उनकी एक बेबाक टिप्पणी)

कविताJune 19, 2018

कविता पंजाबी से अनुवाद : परमानंद शास्त्री वसीयत मेरी मौत पर न रोना मेरी सोच को बचाना मेरे लहू का केसर मिटटी में न मिलाना मेरी भी जिंदगी क्या बस

रागनी धरती बिन कोये धरती कारण धरै गये धार पै भूखमरी की भेंट चढे कोये धन की मारो-मार पै भूमि बिना बेचारा होज्या ना हो ठेल-ठिकाणा-ठोस दो गठड़ी पै हांड

कहानी जब छोरे गाभरू होंगे ताजा लेकर खाने वाले मजदूरों व गरीब किसानों के लिए भादवे का महीना तेरहवां महीना होता है। जहां खाते-पीते लोग सावण-भादवे में घूम-घूम कर आ

कविताएं पिसती है सिर्फ जनता नेता लोगों को बहलाता है नए-नए ख्वाब दिखाता है कुर्सी पर बैठते ही हम सबको आंख दिखाता है पत्रकार झूठी-सुच्ची खबरें लाता है जनता की

कविताJune 19, 2018

कविता बदबू किस ओर चला जा रहा है जीवन, निरर्थक व्यर्थ लाचार क्यों चेतना बांझ हो गई और हो गई है अपंग मस्तिष्क में कूब निकल आया है और हो

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?