फेस बुक – गंगा राम राजी

कहानी


उठते ही मोबाइल पकड़ने लगा हूं। पकड़ने क्या अपने आप ही हाथ मोबाइल पर चला जाता है ठीक उसी तरह से जैसे सिग्रेट के प्यक्कड़ का हाथ सिग्रेट की डिबिया पर चला जाता है और धीरे धीरे बाथ रूम जाने से पहले दो चार कश इधर उधर धुंआ न छोड़ा हो तो पेट भी साफ होने का नाम नहीं लेता। बस यही हालत मेरी मोबाइल के साथ होने लगी थी।

मेरी ही क्या यह बिमारी घर में प्रवेश कर गई है कि दो साल के पोते से लेकर बूढ़ों तक को आ घेर लिया  है। सब इसी मोबाइल के बिमार हो गए हैं। मोबाइल के बिना सबके लिए दूभर हो गया है। यह बाजारवाद अपने पांव इस तरह से पसारने लगा है कि अब हर हिन्दोस्तानी इसके गिरफ्त में फंसता जा रहा है। सोचने लगा कि यह बीमारी कहां से आ गई जो अब सारे जहां को अपने में समेटने में लगी है।

मेरा ध्यान जब से फेस बुक के एक मैसेज पर आया तब से फेसबुक छूटती ही नहीं। क्या करें लोग भी अपनी पसंद का साथी तलाश करने में लगे रहते हैं। उनके सामने फेस बुक के अनगिनत लोग जो हैं फिर चाहे उन्हें ढूंढ कर अपने आगे खड़ा कर लेने में हरज भी क्या है।

दोपहर को लेटा ही था कि मोबाइल पर टन …. की मधुर ध्वनि मुखरित हुई। मेरा हाथ मोबाइल पर जा पड़ा। देखा कि एक सुंदर सी लड़की का चेहरा एक वृताकार में मुस्काने लगा मैंने मोबाइल झट से आंन किया।

” हाय .. ” मोबाइल पर उभर कर आया।

” हाय … ‘‘ मेरी उंगलियां भी जल्दी से जबाब देने लगी। मेरे आगे एक सुंदर चेहरा था। वह भी कम उंम्र की हसीन लड़की का। चाह तो रहा था कि कुछ जबाब नहीं दूं परन्तु लगा कि लगे हाथ शरारत मैं भी कर लूं। जवानी एक दम से शरीर में हिलोरें मारने लगी।

” कैसे हैं आप …. ” जल्दी से दूसरा प्रश्न मोबाइल की स्क्रीन पर उभर आया। मेरे से उठ बैठ होने लगी, और कई प्रकार की उत्सुकता, संदेह आदि मन में उठने लगे। कहीं लड़की को कुछ गलती तो नहीं हो रही है ? कैसे हो सकती है मेरे फेस बुक प्रोफाईल में तो मेरा फोटो मेरी पत्नी के साथ, मेरी आयु, मैं क्या करता हूं सब कुछ तो था ही फिर भी लगा कि लड़की शरारत पर तुली है मेरी उंगलिया जबाव देने में लग गई,

” अरे ठीक हूं …. मुझे तुम्हारी चिंता हो रही है तुम कैसी हो .. ?’’

बस फिर शुरू हो जाता है बातों का सिलसिला।

” आप कहां रहते हैं ? आप क्या करते हैं ? आप अच्छे लगने लगे हंै। ‘‘ आदि आदि बातें होने लगी तो मेरी जिज्ञासा भी बढऩे लगी। और सिलसिला ऐसा चला कि जैसे हम सदियों से एक दूसरे को जानते हैं , पहचानते हैं। बातें इतनी गहरी होने लगी कि जो आपस में ही सुन सकतें हैं दूसरों को नहीं सुना सकते। कहने का अर्थ बहुत आगे की होने लगी। अब तो यह नौबत आ गई कि देरी बरदाशत नहीं होती।

सोचने लगा कि मुझे क्या होने लगा है ? क्या कर रहा हूं। मैं अपनी पत्नी को बेहद प्यार करता हूं। जब यह बात मैंने उससे कह डाली तो, ” फिर क्या हुआ मुझे सब मालूम है … पत्नी पत्नी होती है और मैं तो आपकी मित्र हूं। मेरा अपना स्थान है पत्नी का अपना स्थान हैं मैं पत्नी की जगह तो नहीं ले रही हूं। मैं तो आपसे केवल चैटिंग ही करती हूं जो मुझे अच्छी लगती है मैं तो कोई और काम आपसे नहीं कराती हूं। मुझे अपने ढंग से जीने दो। आप कोई भी उत्तर नहीं दो तो मैं तुम्हारे हर पोस्ट पर पहले की भांति टिप्पणी करती रहंूगी। मैं तो आज की राधा हूं ….आप कामक्रीडा अपनी पत्नी से करते रहो मुझे तो कुछ हरज नहीं, मैं तो प्रेम दिवानी मेरा दर्द न जाने कोए …’’

पता नहीं क्या क्या उसने लिख दिया। मैं पढ़ता रहा, बार-बार पढ़ता रहा। अच्छा भी लगने लगा था और साथ में धर्म संकट भी होने लगा था। मैं अपनी पत्नी से कुछ भी तो छुपाता ही नहीं था और उसके साथ कम-से-कम कभी झूठ तो बोला ही नहीं। कैसी अजीब सी स्थिति मेरे लिए उत्पन्न होने लगी थी वह भी इस उमर में जब एक पांव कब्र पर पड़ रहा हो।

सच कहें मुझे कुछ होने लगा सोचने लगा कि अगर इससे जो कुछ भी होने लगा है इसे ठीक रास्ते पर चलने को कहूं ,

” देखो तुम्हारी उमर और मेरी उमर में तीन गुणा का अंतर है …. ‘‘ मैं डरने लगा था फिर भी अपना फर्ज  समझ कुछ उपदेश देना चाहता था आगे लिखने ही लगा,

”आप एक अच्छा सा लड़का अपनी आयु का देख कर उससे अपना घर बसा लो ……. ‘‘

जवाब झट कट गया उधर से टाइप होने लगा मेरी उत्सुकता बढऩे लगी , स्क्रीन पर टक टक की आवाज होने लगी मेरी आंखे उत्तर देखने के लिए आतुर होने लगी और …..

” जानु उमर क्या प्यार की लक्ष्मण रेखाऐं निश्चित करती है ? आप को कोई ऐतराज हो तो मुझे कोई उत्तर मत दो मैं तो तुम्हें लिखती ही रहूंगी। मैं शरीर से तुम से नहीं जुड़ी हूं … मैं राधा हूं ….  तुम्हारी सारी पीड़ाओं का एहसास मुझे यहां बैठे बैठे हो जाता है। मैं जानती हूं तुम मेरे बारे क्या सोच रहे होते हो…’’ और न जाने बहुत कुछ …….

बस फिर क्या था मेरा धर्म संकट और गहरा गया। दोनों ओर उलझन होने लगी। एकांतवास होने लगा , खोया-खोया से रहने लगा …. ।

सब बातें समझ से बाहर। फिर वह भी ऑफ  हो जाती और इधर लग जाता कब ऑन लाइन वह आ जाए। कई तरह के नोट भी देता रहता …. आ आ जा … आदि।

एकांत मिलते ही ध्यान जाता कि मुझे क्या हो गया है किस चक्कर में फंस गया हूं। जवानी में नहीं फंसा तो इस उमर में क्या होने लगा है। सामने वाली लड़की भी तो गलत नहीं हो सकती उसने आगे बढऩे से पहले सारा प्रोफाइल छान मारा होगा। और मैं तभी ही फेसबुक खोल कर बैठ जाता हूं। अरे सच में उसने मेरे सारी पोस्टिंग पर अपने कमेंट और लाइक किया है। कई जगह तो उसने प्यार का स्टिकर डाला है। अरे मैंने तो ध्यान से आज तक देखा भी नहीं था।

बस उसी समय वह ऑनलाइन आ गई। मैं खुश हुआ सोचने लगा कुछ पूछूं अरे तभी उसकी ओर से कुछ टाइप होने लगा आवाज आने लगी जैसे पानी की बूंदें पानी में ही गिर रही हों और देखते-ही-देखते एक अर्धनग्न उसकी मुस्काते हुए की तस्वीर …मैं तो जैसे पागल होने लगा क्यों मैं उसके बारे में सोचने लगा था वह तो मुझ से धोखा नहीं कर सकती सोचने लगा कि उसे अपने बारे में एक नोट लिख ही डालूं ,उसे एक बार फिर याद दिला लूं ,

”मैं एक शादी शुदा इनसान जो दादा बना हूं पोतों वाला हूं … अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता हूं …. ‘‘

तभी झट से उधर से उत्तर आता है , ” मैं तुम से प्यार करती हूं तुम्हारे नाम से सांस भरती हूं तुम्हें सब कुछ दे चुकी हूं सब चीजें अपनी अपनी जगह अलग हैं , मुझे आपकी पत्नी से भी प्यार है तुम से भी प्यार है तुम्हारे रोम रोम से प्यार है …।’’

अरे मर गया। क्या करूं? कई प्रश्न आने लगे परन्तु उतना ही झुकाव भी होने लगा। मेरा काम जागृत होने लगा। दूर से ही ललकार भरने लगा। न जाने मुझे क्या सूझी, शाम को अपने बाल रंग दिए। काले बालों को देख मैं स्वयं अपने को देख हैरान हो गया। तभी मेरी नजर पत्नी के आई ब्रो पैंसिल पर पड़ी। झट से उठा ली और मूंछों वाले स्थान पर थोड़ी-थोड़ी रेखाएं इस तरह से मारी कि मूंछों के बाल तो काले ही हैं लेकिन काट लिए गए है। क्या रंग दारी हो गई। फिल्मी दुनियां के मेकअप से भी बढ़कर एक नया चरित्र उभर कर सामने आ गया।

बस क्या कहना एक जवानी झलकने लगी। मैं अपने को जवान समझने लगा। बार-बार अपने को आईने में डुबकी मारने लगा।

कमरे में प्रवेश करते ही पत्नी की नजर जब मेरे पर पड़ी तो वह देखती ही रह गई।

”अरे क्या … तुम ही हो?’’ और वह मेरी जवानी को देख वह भी जवान हो गई। बस फिर क्या था मेरी ओंठो के ऊपर की आई ब्रो पैंसिल की रेखाएं सब मिट गईं थीं। मुझे तो तब पता चला जब पत्नी ने पूछा,” महाराज एक ही फेरे में मूंछों की जवानी …’’ और वह आगे कुछ न बोल पाई क्योंकि वह जोर से हंसी ही जा रही थी और कमरे से बाहर हंसते हुए चली भी गई।

‘कितने स्पष्ट हृदय के अंदर से निकली हुई और कपट से रहित हंसी …  छल कपट का नाम निशान नहीं … केवल प्यार ही प्यार और पूर्ण रूप से आत्म समर्पित … अरे मैं तो अपनी इस प्रिय से छल कपट पर उतरने लगा हूं। अरे क्या होता जा रहा है मुझे मैं तो कभी ऐसा नहीं था। जवानी में एक पत्नीव्रत धर्म निभाने वाला ही रहा अब जब कुछ शरीर में नहीं बचा है तो क्या होता जा रहा है … चढ़ी जवानी बुढ्ढे नूं ..  ‘

”चलो पहलवान जी खाना खा लो …’’ आवाज आई मैं अपने को गुनाहगार समझने लगा। अभी खड़ा ही था कि पोता मुझे लेने आ गया, ” दादू … चलो न यार’’ और वह मेरा हाथ पकड़ कर ले चला।

‘इस मेनका ने मेरे विश्वामित्र का सेक्स जागृत कर दिया है। इस मेनका को किस इंद्र ने मेरे पीछे लगा दिया है यह इंद्र मेरे से क्या चाहता है ? क्योंकि इतना जानते हुए भी मेरा मन मान ही नहीं रहा था। चलो एक बार इस लड़की से मिलना ही चाहिए उसे समझाना चाहिए कि मैं उसके काबिल तो नहीं हूं कहीं और जगह पर ही उसे घंटी बजानी चाहिए।

सब तय हुआ था कि वह गरीब रथ से आ रही है मैं उसे रेलवे स्टेशन पर ही मिलूंगा चल पड़ा। शेव की, सेंट कभी लगाया नहीं, खूब छिड़काव किया, चारों ओर सुगंध से वातावरण ही बदल गया, बढिय़ा सा सूट निकाला अपने चेहरे को बार-बार आईने में निहारा, बचे हुए बालों पर एक बार हाथ फेरा, अपने दांतों के जाली जबड़े को मुंह में ही दबा कर परखा की काम के हैं भी या … ऑनलाइन थ्री स्टार होटल का कमरा बुक और लगा कि सब ठीक है तो सेहरा बांधे चल पड़ा।

संपर्क में था गरीब रथ ट्रेन थ्री ए सी कंपार्टमैंट सीट नम्बर दस। रात बारह बजे ट्रेन के पहुंचने का समय। मैं पहले ही स्टेशन पहुंच गया भीड़ थी चहल पहल थी। मैं किसी को भी नहीं देख रहा था। बार-बार घड़ी देखता। कुली से पूछता ,

”भाई गरीब रथ का थ्री ए सी यहीं पर रूकता है .. ?’’

” यहीं पर रुकता है यह देख बाबा ऊपर बोर्ड भी लगा है … ‘‘ बोलता हुआ कुली चला तो गया पर मेरे को एक बार जोर से तमाचा मार कर अदृश्य हो गया। ‘बाबा’ शब्द ने मेरी जवानी की जमीन को हिला दिया था। मेरी टांगे लडख़ड़ाने लगी, मैं एक किनारे खडा नहीं हो पा रहा था पास की बैंच पर बैठ कर टाइम देखने लगा।

कई ट्रेन सीट्टी बजाती आती गई सवारियां उतरती चढ़तीं गई, लगा कि मैं पहले ही आ गया था। किसी भी ट्रेन की सीट्टी बजते ही मैं उठ जाता देखने लगता कि कहीं गरीब रथ तो नहीं। यह मालूम भी था कि भारत की ट्रेन इन टाइम हो सकती है देरी से तो रहती ही हैं परन्तु बिफोर टाइम नहीं हो सकती …

और ट्रेन गरीब रथ समय पर पहुंच गई। मैं थ्री ए सी के सामने ही खड़ा हूं। मैं सवारियों के उतरने का इंतजार नहीं करता हूं। लाल रंग की वर्दी पहने कुलियों के साथ मैं ट्रेन पर चढऩे लगता हूं कि उतरने वाली सवारी के धक्के से नीचे गिरने से पहले ही संभल गया और हिम्मत कर अपने को संभालते हुए ट्रेन में चढ़ ही जाता हूं, दस नम्बर की सीट के पास जाता हूं। मैं बार-बार सीट नम्बर पढऩे की कोशिश कर रहा हूं सामने दस नम्बर ही लिखा है, अपनी ऐनक को उतार कर लैंस साफ करता हूं फिर नम्बर पढ़ता हूं, दस नम्बर सीट के पास बैठी एक बूढ़ी सी औरत अपने सामान को समेटे जा रही है। मेरे से रहा नहीं गया मेरी आयु की मोहतरमा से मैंने पूछना चाहा तभी मेरी आयु का ही एक सज्जन उससे कुछ पूछ रहा था मैं यह जान कर कि यह शायद उनके साथ ही हो सुनने लगा,

” मोहतरमा आप, …  इस सीट पर तो जयपुर से एक लड़की ने आना था ?’’

औरत ने एक नजर उस पर डाली और अपने सामान को इकठ्ठा करने में बाधा पड़ने से झल्ला कर बोली,

”एक ओर हो जा इस सीट पर तो मैं मुम्बई से आ रही हूं … किस लड़की के चक्कर में हो अब तो सब्र करो … ‘‘ एक चुटकी लेते वह अपने सामान को इकट्ठा करने लग गई ।

मैं चुप हो गया था मेरा काम तो इस सज्जन ने ही कर लिया था। मैं दो चार कंपारटमेंट के दस नम्बर की सीट पर देखने तेजी से भागा, दस नम्बर की सीट पर मुझे कोई हसीना नहीं दिखाई दी … मैं बाहर की ओर सभी सवारियों को देखने लगा हूं फेसबुक की सुन्दरी मुझे कहीं नहीं दिखाई दी।

तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं यह तो वही आदमी है जो अभी दस नम्बर की सीट पर मोहतरमा से बात कर रहा था।

”आपने इस लड़की को तो नहीं देखा? ‘‘ वह अपने मोबाइल पर एक फोटो दिखाकर मेरे से पूछ रहा था। फोटो देख मैं कभी फोटो को कभी उस आदमी को देखने लगा। कई प्रश्न एकदम से दिमाग में उछलने लगे। वह मेरी ओर हैरानी से देखने लगा। मैं मुस्काने के साथ जोर से हंसने लगा और आगे की ओर बढऩे से पहले मेरे मुंह से निकल ही पड़ा,

” चढ़ी जवानी बुढ्ढे नूं …. ‘‘

और बुक कराए होटल की ओर अपने पर हंसता, झल्लाता हुआ स्टेशन से बाहर की ओर चल पड़ा।

सम्पर्क : 9418001224

One Comment

(Hide Comments)
  • Rooppendra Kumar

    June 30, 2018 / at 10:35 am Reply

    बहुत अच्छी पोस्ट है। आज की फ़ेसबुक की सच्चाई बयान की है आपने। कैसे लोगों को बेवकूफ बनाया जाता है। कैसे उनका विश्वास तोड़ा जाता है। सच्ची कहानी है।

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