ज़ोहरा बाई अम्बाला वाली (अम्बाला) – महेन्द्र प्रताप चांद

आलेख


महेन्द्र प्रताप चांद

ज़ोहराबाई का जन्म सन् 1922 के आसपास हुआ। उनके जन्म-स्थान के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन वे पिछली सदी के चौथे दशक में अम्बाला शहर के हुस्न के बाज़ार की रौनक थीं। इनका वास्तविक नाम ज़ोहरा जान था और ये सन् 1937 से (अर्थात् मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में) आल इंडिया रेडियो- दिल्ली, लाहौर और पेशावर केंद्रों से अपनी सुरीली और मधुर आवाज़ में ‘ज़ोहरा जान आफ़ अम्बाला’ के नाम से गाया करती थीं। इन्हें बम्बई की फिल्मी दुनिया में ले जाने वाले सुप्रसिद्ध व  सुविख्यात संगीतकार मास्टर गुलाम हैदर थे, लेकिन जिस फिल्म से उनकी जादुई आवाज़ की धूम मची, वह सन् 1944 में  आई फिल्म ‘रतन’ थी, जो नौशाद अली साहब के संगीत से सजी थी। इस फिल्म के सदाबहार गीत आज भी कला-पारखियों के कानों में रस घोलते हैं। इस फिल्म में  उन्होंने सात गीत गाए थे-‘अखियां मिलाके, जिया भरमा के चले नहीं जाना’, ‘सावन के बादलो! उनसे ये जा कहो, तक़दीर में यही था साजन मेरे न रो’, ‘आई दिवाली, आई दिवाली, दीपक संग नाचे पतंगा, मैं किसके संग नाचूं, बता जा’ आदि। उसके बाद उन्होंने सन् 1953 तक फ़िल्मों में लगभग 1500 गीत गाए, जिनमें अधिकतर गज़लें थीं। इनमें से कई बहुत लोकप्रिय हुईं, जैसे एक बहुत ही पुरानी फिल्म ‘नागिन’ में शकील बदायूं की यह ग़ज़ल-‘क्या बताएं कितनी हसरत दिल के अ$फसाने में है, सुबह गुलशन में हुई और शाम वीराने में है।’ इसी तरह फिल्म ‘मेला’ (सन् 1948) में शकील साहिब की ही एक और ग़ज़ल-‘शायद वो जा रहे हैं, छुपकर मिरी नज़र से’, फिल्म ‘कारवां’ में ‘आंखों में इंन्तिजार की दुनिया लिए हुए’, फिल्म ‘दूसरी शादी’ में ‘टूटा हुआ दिल गाएगा क्या गीत सुहाना, हर बात में ढूंढेगा वो रोने का बहाना’ आदि। सन् 1945 में बनी फिल्म ‘ज़ीनत’ में नखशब साहब की लिखी मशहूर कव्वाली ‘आहें न भरीं, शिकवे न किए,  कुछ भी न ज़बां से काम लिया’ में नूरजहां और दूसरी गायिकाओं  के साथ ज़ोहराबाई की सुरीली आवाज़ भी शामिल थी।

ज़ोहराबाई बहुत ही शिष्ट, सुशील और स्वाभिमानी महिला थीं। फिल्मी दुनिया में वे अपने हर गीत के लिए दो हजार रुपए पारिश्रमिक लेती थीं, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी। बसंत देसाई के संगीत में बनी एक फिल्म ‘मतवाला शायर राम जोशी’ में उन्होंने बीस गाने गाये थे और चालीस हजार रुपए पारिश्रमिक लिया था। सन् 1950 के बाद कुछ नई गायिकाएं आ गईं और इन्हें कम पारिश्रमिक पर गाने के लिए कहा गया तो इन्होंने इसे स्वीकार करने की अपेक्षा फिल्मों में गाना ही छोड़ दिया। जबकि अधिकतर कलाकार प्राय: दौलत और शोहरत के पीछे भागते हैं, लेकिन ज़ोहराबाई पब्लिसिटी से बहुत दूर रहती थीं और प्रेस वालों से भी बहुत बिदकती थीं।

ज़ोहराबाई ने जहां अपनी मधुर आवाज़ से वर्षों तक संगीतप्रेमियों के दिलों में अपना स्थान बनाया और अपनी कलात्मक विशेषताओं की धाक जमाई, वहीं अपने नाम के साथ ‘अम्बाला वाली’ जोड़कर अम्बाला के नाम को भी रोशन कर दिया। उन्होंने पंजाब के प्रसिद्ध और विख्यात तबला और पख़ावज-वादक ‘उस्ताद फ़क़ीर मोहम्मद’ से विवाह किया था, जिनसे उनकी एक बेटी भी है-रौशन कुमारी, जो फिल्म अभिनेत्री होने के साथ-साथ एक उच्च कोटि की नर्तकी भी है और बांद्रा मुंबई में ‘कला केंद्र’ के नाम से एक डांस स्कूल चली रही हैं। रौशन कुमारी साहिबा को उनकी कलात्मक विशिष्टताओं और उपलब्धियों के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और ‘पदम् श्री’ के अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

ज़ोहराबाई साहिबा 21 फरवरी, 1990 को इस नश्वर दुनिया को छोड़कर चली गईं, लेकिन उनके हृदयस्पर्शी गीतों की गहरी छाप केवल संगीत प्रेमियों के दिलों में ही नहीं, बल्कि कला व साहित्य-मनीषियों के दिलों में भी हमेशा कायम रहेगी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 29

 

Search
Loading

Signing-in 3 seconds...

Signing-up 3 seconds...

Discover more from desharyana.in

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

RETURNING FOR ANOTHER TRIP?